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________________ ४८३ गोवीथिं चतुर्दश पञ्चदशोऽध्यायः कुरुते श्येत समनुप्राप्तः प्रवासं दशाहानि गत्वा शुक्र (गोवीथिं समनुप्राप्तः ) गोबीधि को प्राप्त कर अस्त होता है ( प्रवासं कुरुते यदा) पुनः वह उदय हो तो ( चतुर्दशदशाहानि ) चौदह दिनों में (गत्वा) जाकर ( पूर्वतः दृश्येत ) पूर्व में उदय होगा । भावार्थ --- यदि शुक्र गोवीथि में अस्त हो तो वह शुक्र वापस चौदह दिनों में जाकर पूर्व में उदय होगा ॥ २१९ ॥ कुरुते दृश्येत यदा । पूर्वतः ॥ २९९ ॥ वृषविधिमनुप्राप्तः प्रवासं तदा द्वादश रात्रेण गत्वा ( यदा) जल शुक्र (नृपनीशिमनुप्राप्तः ) नृषवीथि को प्राप्त कर अस्त होता है पुनः वह ( प्रवासं कुरुते ) प्रवास करे तो ( तदा) तब ( द्वादशरात्रेण ) बाहर रात्रियों के पश्चात् (गत्वा) जाकर (पूर्वतः दृश्येत) पूर्व में दिखेगा । भावार्थ--जब शुक्र वृषवीथि में अस्त हो तो पुनः वह बारह रात्रियों में जाकर पूर्व में उदय होगा ।। २२० ।। प्राप्त: ऐरावणपथं प्रवासं तदा स दशरात्रेण पूर्वतः ( यदा) जब शुक्र (ऐरावणपथं प्राप्तः ) ऐरावण पथ को प्राप्त कर अस्त होता है तो ( प्रवासं कुरुते ) पुनः वह प्रवास करे तो (तदा) तब ( स ) वह (दशरात्रेण) दसरात्र में जाकर (पूर्वतः ) पूर्व में (प्रतिदृश्यते) प्रवास करेगा। कुरुते यदा । पूर्वतः ॥ २२० ॥ यदा । प्रतिदृश्यते ।। २२१ । भावार्थ — जब शुक्र ऐरावणवीथि को प्राप्त कर अस्त होता है तो फिर वह वापस दस रात्रियों के पश्चात् पूर्व में जाकर उदय होगा ।। २२१ ।। कुरुते गजवीथिमनुप्राप्तः प्रवासं अष्टरात्रं तदागत्या पूर्वतः ( यदा) जब शुक्र ( गजवीथिमनु प्राप्तः ) गजवीथि को प्राप्त कर अस्त होता है तो ( तदा) तब ( अष्टरात्रं) आठ रात्रि में (गत्ना) जाकर पुन: (पूर्वतः ) पूर्व में ( प्रतिदृश्यते ) उदय होगा । यदा । प्रतिदृश्यते ॥ २२२ ॥
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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