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________________ ३१५ त्रयोदशोऽध्यायः भावार्थ-जब घोड़े हँसते हुए अर्द्धवृत्ताकार होकर प्रमोदित मन होकर दौड़ते हैं तो समझो राजा की विजय होगी ।। १४५ ॥ पादं पादेन मुक्तानि निःक्रमन्ति यदा हयाः । पृथन् पृथम् संस्पृश्यन्ते तदा विन्द्याद्भयावहम् ॥ १४६ ॥ (यदा हयाः) जब घोड़े ( पादं पादेन मुक्तानि ) पाँव से पाँव पृथक् करके ( निःक्रमन्ति) निकले और वह भी ( पृथग्पृथग्संस्पृश्यन्ते) पृथक्-पृथक् स्पर्श करे तो ( तदा ) तब ( भयावहम् विन्द्याद्) भय को उत्पन्न करेंगे ऐसा जानो । भावार्थ— जब घोड़े पाँव से पाँव अलग करके चले और अलग-अलग स्पर्श करे तो राजा को भय होगा ऐसा जानो ॥ १४६ ॥ यदा राज्ञः प्रयातस्य वाजिनां संप्रणाहिकः । पथि च म्रियते यास्मिन्नचिरात्मा नो भविष्यति ।। १४७ ।। ( यदा राज्ञः प्रयातस्य ) जब राजा के प्रयाण समय में ( वाजिनां ) घोड़ों को ( संप्रणाहिक: ) पालन करने वाला (पथि च म्रियते) मार्ग में ही मर जाय तो ( यस्मिन्नचिरात्मा नो भविष्यति ) राजा का मरण निकट है वह चिरकाल तक नहीं जी सकता है। भावार्थ — राजा के प्रयाण समय में घोड़ों का पालन करने वाला मार्ग में ही मर जाय तो समझो राजा का शीघ्र ही मरण हो जाने वाला है ।। १४७ ।। शिरस्यास्ये च दृश्यन्ते यदा हृष्टास्तु वाजिनः । तदा राज्ञो जयं विन्द्यान्नचिरात् समुपस्थितम् ॥ १४८ ॥ ( यदा वाजिनः ) जब घोड़े (शिरस्यास्ये च हृष्टास्तु दृश्यन्ते) सिर और मुख से प्रशन्न दिखे तो ( तदा राज्ञो) तब राजा को (जयं विन्द्यात्) जय होगी (अचिरातसमुपस्थितम् ) ऐसा शीघ्र तुम भावार्थ- जब घोड़े सिर से राजा की शीघ्र ही जय होगी ।। १४८ ॥ जानो ! और मुख से प्रशन्न दिखलाई पड़े तो समझो
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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