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________________ २३७ एकागोयामः जनताको लाभ, पारस्परिक प्रेम, शान्ति और सुभिक्ष होता है। शुक्रवारको इस महीनमें गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो साधारण व्यक्तियोंको विशेष लाभ, धनी-मानियोंको कष्ट प्रशासकवर्गकी हानि, तत्प्रदेशीय किसी नेताकी मृत्यु, कलाकारोंको कष्ट और वर्षा साधारणत: अच्छी होती है। फसल भी अच्छी होती है। इसी महीनमें शनिवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो वर्षाका अभाव, दुर्भिक्ष, जनताको कष्ट, तेज वायु या तूफानोंका प्रकोप, अग्निभय, शस्त्रभय, विषैले, जन्तुओंका विकास तथा उनके प्रभावसे जनतामें अधिक आतंक होता है। आषाढ़ महीनमें मंगलवारके दिन गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो अच्छी वर्षा, सुभिक्ष, अन्नका भाव सस्ता, सोना, चाँदीके मूल्यमें भी गिरावट, कलाकार और शिल्पियोंको सुख-शान्ति, देशका आर्थिक विकास, व्यापारी समाजको सुख और प्रशासकोंको भी शान्ति मिलती है। केवल लोहेकी बनी वस्तुओंमें हानि होती है। इसी महीनेमें बुधवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो जनताको साधारण कष्ट, अच्छी वर्षा, सुभिक्ष और व्यापारमें साधारण लाभ होता है। वज्रपातका योग अधिक होता है। इस दिन गुरुवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो भी जनताको विशेष लाभ, अच्छी वर्षा, सुभिक्ष, श्रेष्ठ फसल, व्यापारमें लाभ और सभी प्रकारका अमन-चैन रहता है। शुक्रवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो साधारण वर्षा, पर फसल अच्छी, वस्त्रके व्यापारमें अधिक लाभ, मशीनोंके कल-पुोंमें अधिक लाभ, गुड़, चीनीका भाव सस्ता एवं प्रतिदिन उपभोगमें आनेवाली वस्तुएँ महँगी होती हैं। शनिवारको गन्धर्वनगर उक्त महीनेमें दिखलाई पड़े तो साधारण वर्षा, फसलकी कमी और व्यापारियोंको कष्ट होता है। श्रावणमासमें मंगलवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो वर्षाकी कमी, किन्तु भाद्रपदमें अच्छी वर्षा, फसल साधारण, धन-धान्यकी वृद्धि, व्यापारियोंको लाभ, जनताको कष्ट, वस्त्रका अभाव, आपसी कलह और उक्त प्रदेशमें उपद्रव होते हैं। बुधवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो अल्पवर्षा, साधारण फसल, घी की महंगी, तेलकी भी महँगी, वस्त्रका बाजार सस्ता, सोना-चाँदीका बाजार भी सस्ता, शरद् ऋतुमें अधिक शीत, अन्नका भाव भी महँगा रहता है। साधारण जनताको तो कष्ट होता ही है, पर धनी-मानियोंको भी अनेक प्रकारके कष्ट सहन करने पड़ते हैं। गुरुवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो अच्छी वर्षा, सुभिक्ष, जनतामें शान्ति और
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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