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________________ एकादशोऽध्यायः और अन्य प्रकारके उपद्रव भी होते हैं। तेज वायु चलती है, आश्विन मासमें कुछ बर्षा होती है, जिससे साधारण रूपसे चैती फसल हो जाती है। रविवारको सन्ध्यामें गन्धर्वनगर देखने से भूकम्पका भय, मध्याह्न में गन्धर्वनगर देखनेसे जनतामें अराजकता एवं प्रातःकाल सूर्योदयके साथ गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो नगरमें साधारणत: शान्ति रहती है। सन्ध्याकालका गन्धर्वनगर बहुत अधिक बुरा समझा जाता है । रातमें दिखलाई देनेसे कम फल देता है । मेघविजय गणिने रविवारके गन्धर्वनगरको अधिक अशुभकारक बतलाया है। इस दिनका गन्धर्वनगर वर्षाका अभवा करता है तथा व्यापारिक दृष्टिसे भी हानिकारक होता है। सोमवारको गन्धर्वनगर दीप्तियुक्त दिखलाई पड़े तो कलाकारोंके शुभफल, प्रशासकवर्ग और कृषकोंके लिए भी शुभ फलदायक होता है। इस प्रकारके गन्धर्वनगरके देखनेसे श्रावण और आषाढ़ मासमें अच्छी वर्षा होती है । भाद्रपद और आश्विनमें वर्षाकी कमी रहती है। यदि इस प्रकारका गन्धर्वनगर श्रेष्ठमासमें रविवारको दिखलाई पड़े तो निश्चयतः दुर्भिक्ष होता है। आषाढ़में रविवारको दिखलाई पड़े तो अश्विनमें वर्षा, अवशेष महीनोंमें वर्षाका अभाव तथा साधारण फसल, श्रावणमें दिखलाई पड़े तो भूकम्पका भय, मार्गशीर्ष में अल्प वर्षा, वन-बगीचोंकी वृद्धि, खनिज पदार्थोंकी उपजमें कमी, भाद्रपद मासमें रविवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो आश्विन और कार्तिकमें अनेक प्रकारके रोग, जनतामें अशान्ति का उपद्रव होते हैं। आश्विन मासमें रविवारको गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो साधारण कष्ट, माघ में ओलोंकी वर्षा, भयङ्कर शीतका प्रकोप और चैती फसलकी हानि होती है । कार्तिक और अगहन मासमें रविवारके दिन गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो अनेक प्रकारके रोगों के साथ घृत, दूध, तेल आदि पदार्थोंका अभाव होता है, पशुओंके लिए चारेकी भी कमी रहती है। पौष और माघ मासमें गन्धर्वनगर रविवारको दिखलाई पड़े तो छः महीनों तक जनताको आर्थिक कष्ट रहता है। निमोनिया और प्लेग दो महीने तक विशेष रूपसे उत्पन्न होते हैं। होलीके दिन गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो आगामी वर्ष घोर दुर्भिक्ष पड़ता है । अन्नकी अत्यन्त कमी रहती है, चोर और लुटोरोंका भय आतंक बढ़ता चला जाता है। फाल्गुन और चैत्रमें रविवार के दिन गन्धर्वनगर दिखलाई पड़े तो जिस दिन गन्र्धवनगरका दर्शन हो उससे ग्यारह दिनके भीतर भूकम्प या अन्य किसी भी प्रकारका महान् उत्पात होता है। वज्रपात होना या आकस्मिक घटनाओंका घटित होना आदि फलादेश समझना चाहिए। वैशाख २३५
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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