________________
बार
भद्रबाहु संहिता
मंगलाचरण
पार्श्वनाथ भगवान को, और सरस्वती माँय। गणधर को मैं नमनकर, पाँऊ केवल ज्ञान॥१॥
आदि, शान्ति, आचार्यवर, महावीर कीर्ति गुरुराज। विमल, सन्मति गुण के भरे, पूरो मेरे काज॥२॥ इन सब को मैं नमनकर, भाषा लिखू बनाय। भद्रबाहु की संहिता, पूरो जग की आस ।। ३ ।। अष्टांग निमित्त ज्ञानी गुरु, अन्तिम श्रुत को धार । भद्रबाहु श्रुत केवली, नमन करूँ मैं आज ।। ४ ।।