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________________ पविशतितमोऽध्यायः 431 431 स्वप्नमाला दिवास्वप्नोऽनष्टचिन्ता मय:फलम् । प्रकृता-कृतस्वप्नश्च नेते ग्राह्या निमित्ततः ॥2॥ स्वप्नमाला, दिवास्वप्न, चिन्ताओं से उत्पन, लोग ग उत्पन्न और प्रवृति के विकार के उत्पन्न स्वप्न फल के लिए नहीं ग्रहण करना चाहिए ।।2।। कर्मजा द्विविधा यत्र शुभाश्चानाशुभास्तथा। विविधा: संग्रहा: स्वप्ना: कर्मजा: पूर्वसचिता: ।।3।। नामोदय से उत्पन्न स्वप्न दो प्रकार क होते हैं—म और आगन तथा पूर्व संचित करदिय से उत्पन्न स्वप्न तीन प्रकार में होत है ।।3।। भवान्तरेषु चाभ्यस्ता भावा: सफल-निमला:। तान् प्रवक्ष्यामि तत्त्वेन शुभाशुभफलानिमान् ॥वा। जो सफल या निष्पल भाब भवान्तों में अपना है, उगा मामा दायर भावों को यथार्थ रूप में निरूपण करता है ।।111 जलं जलरुहं धान्यं सदलाम्भोजभाजनम । मणि-मुक्ता-प्रवालांश्च स्वप्ने पश्यन्ति श्लेष्मिःTः ।।5।। जल, जल मे उत्पन्न पदार्थ, धान्य, गय सहित कपल, मणि, माती. श्वान आदि को स्वप्न में कफ प्रकृति वाला व्यक्ति देखता है ।। 511 रक्त-पीतानि द्रव्याणि यानि पुष्टान्यग्निसम्भवान् । तस्योपकरणं बिन्धात् स्वप्ने पश्यन्ति पत्तिकाः ।।6।। रक्त-पीत पदार्थ, अग्नि मंस्कार से उत्पन्न पदार्थ, वर्ण के आभूषण-उपमण आदि को पित्त प्रकृति वाला व्यक्ति स्वप्न में दिानता है ।।6।। च्यवनं प्लवनं यानं पर्वताऽग्र द्रमं गहम् । आरोहन्ति नरा: स्वाने वातिका: पक्षगामिनः ॥7॥ वायु प्रकृति वाला व्यक्ति गिरना, तैरना, सबारी पर चढना, पवन में कार चढ़ना, वृक्ष और प्रासाद पर चढ़ना आदि वस्तुओं को स्वप्न में दग्वता है 11711 सिंह-व्याघ्र-राजयुक्तो गो-वृषाश्व रैथुत:।। रथमारा यो याति पृथिव्यां स नशे भवेत् ॥8॥ जो सिंह, च्यान, गज, गाय, बैल, गोडा और मनाया में यक्स होकार रथ पर चढ़कर गमन करते हुए स्वप्न में देखता है वह राजा होता है 118।।
SR No.090073
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 1
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages607
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size13 MB
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