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________________ बारसाणु पेमरवा ८२ १०. निर्जरा अनुप्रेक्षा जिस कारण से संतर उसी से निर्जरा भी बंधपदेसग्गलणं णिज्जरणं इदि जिणेहि पण्णत्तं । जेण हवे संवरणं तेण दुणिज्जरणमिदि जाण ॥६६॥ अन्वयार्थ: बंधपदेसग्गलणं णिज्जरणं जेण संवरणं हो - पूर्वबद्ध कर्मों का गलना . - निर्जरा कहलाती है तथा - जिन भावों से संवर होता है अथवा जो संवर के कारण है - उन्ही भावों से निर्जरा भी होती है - ऐसा जानो • इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान ने कहा है । तेण दुणिज्जरणं इदि जाण इदि जिणेहि ॥६६॥ भावार्थ- पूर्व बद्ध कर्मों का तप आदि के द्वारा निर्जीण होना निर्जरा कहलाती है । जिन भावों या कारणों से संवर होता है उन्हीं भावों से निर्जरा भी होती है। यही बात तत्त्वार्थ सूत्र में भी कही है। गधा - "तपसा निर्जरा च" अर्थात् - सम्यक्तप से निर्जरा भी होती है और संवर भी होता है । • कुसलस्स तवो णिवुणस्स संजमो सम्मपरस्सवेरगो। सुदभावेण तत्तिय तह्म सुदभावणं कुणह ।।१५१।। (र. सा.)
SR No.090072
Book TitleBarsanupekkha
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorVishalyasagar
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size1 MB
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