SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 49
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [बारसागरला मिथ्या मान्यता से संसार भ्रमण मिच्छोदयेण जीवो जिंदंतो जोण्ह भासियं धम्मं । कुधम्म कुलिंग - कुतित्थं मण्णंतो भमदि संसारे ।।३।। यह गाथा मूलाचार में इस प्रकार है मिच्छत्तेणाछण्णो मग्गं जिनदेसिदं अपेक्खंतो। भमि हदि भीम कुडिल्ले जीवो संसार कंतारे ।।७०५|| अन्वयार्थ:मिच्छोदयेण जीवो जोह (जिण) भासियं धम्म णिंदतो कुधम्म कुलिंग कुतित्थं मण्णंतो संसारे भर्माद - जो जीव मिथ्याल्व कर्म के उदय से - जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे हुये - धर्म की - निंदा करता है तथा - कुधर्म, कुतीर्थ और कुलिंग को - मानता है (वह) - संसार में घूमता हैं ।।३२॥ भावार्थ- जो जीव मिथ्यात्व कर्म के उदय से जिनेन्द्र भगवान द्वारा कथित धर्म की निंदा करता है तथा कुधर्म, कुतीर्थ और कुलिंग को मानता है। वह संसार में धूमता है। • परनिन्दा प्रकुर्वन्ति गुणान् प्रच्छादयन्ति ये। ते मूढा श्वभ्रगा ज्ञेया भूरिपापवृता खलाः।। प्र. श्रा. २६७|| अर्थ- जो मनुष्य पर की निंदा करते रहते है और दूसरों के गुणों को ढकते रहते है । वे दुष्ट सबसे अधिक पापी है। उन मूवों को नरक में ही स्थान मिलता है।
SR No.090072
Book TitleBarsanupekkha
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorVishalyasagar
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size1 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy