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________________ वारसाणु पेक्खा अन्वयार्थ: इंद्रधनुषसम सामग्गिं दियरूवं आरोग्गं जोव्वणं बलं तेजं । सोहणं लावणं सुरधशुमित्र सरसयं ण हवे ||४|| यहगाथा मूलाचार में इस प्रकार है सामग्गिं रूवं मदि जोवण जीवियं बलं तेजं । हि सयणासण भंडादिया अणिच्चेति चिंतेज़ो ।। ६९६ ।। सामग्गिं इंदिय रूवं आरोग्गं जोठवणं बलं तेजं सोहगं सुरधणुं इव सस्यं ण हवे १९ बाहय ( परिग्रह रूप) सामग्री इंद्रियां, रूप, आरोग्य यौवन, बल तेज सौभाग्य और लावण्य इंद्रधनुष की तरह शाश्वत नहीं है। अर्थात नष्ट होने वाले हैं। |४|| भावार्थ- चेतन अचेतन रूप समस्त बाह्य एवं रागद्वेष मोहरूप आभ्यंतर सामग्री ( परिग्रह ) सुंदर रूप, निरोगिता, यौवन अवस्था, शारीरिक या अन्य सैन्यादि बल शरीर का तेज (कांति) सौभाग्य, और लावण्यता विनाशीक है शाश्वत नहीं है। जा सासया ण लच्छी चक्राणं पि पुण्णवंताणं । सा किं बंधेइ रई इयर - जणा अण्णाणं ॥ (का. अनु. १०)
SR No.090072
Book TitleBarsanupekkha
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorVishalyasagar
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size1 MB
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