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________________ -४४] पुण्याद्विना न सुखलवोऽपीत्यत्र दृष्टान्तः ४३ खातेऽभ्यासजलाशयाऽजनि शिला प्रारब्धनिर्वाहिणा भयोऽभेदि रसातलावधि ततः कृच्छात्सुतुच्छं किल । दृष्टान्तद्वारेण समर्थयते- खाते इत्यादि । खाते खनने । कया । अभ्यासजलाशया निकटे जलप्राप्तोच्छया। अजनि संजाता। कासौ । शिला। प्रारब्धनिर्वाहिणा खननम् विशेषार्थ- जो अज्ञानी प्राणी विषयतृष्णाके वश होते हुए अभीष्ट भोगोपभोग वस्तुओंको प्राप्त करके यथार्थ सुख प्राप्त करना चाहते हैं उनका यह प्रयत्न इस प्रकारका है जिस प्रकार कि सूर्यके तापसे पीडित होकर कोई मनुष्य उस संतापको दूर करनेके लिए अग्निसे जलते हुए ऊंचे वांसोंको छायाको प्राप्त करनेका प्रयत्न करता है। अभिप्राय यह है कि प्रथम तो ऊंचे वांसोंको कुछ उपयुक्त छाया ही नहीं पडती है, दूसरे वे अग्निसे जल भी रहे हैं, अतएव ऐसे वांसोंकी छायाका आश्रय लेनेवाले प्राणीका वह संताप जिस प्रकार नष्ट न होकर और अधिक बढता ही है उसी प्रकार विषयतृष्णाको शान्त करनेकी अभिलाषासे जो प्राणी इष्ट सामग्रीके संचयमें प्रवृत्त होता है इससे उसकी वह तृष्णा भी उतरोत्तर बढती ही है, परन्तु कम नहीं होती। जैसा कि समन्तभद्र स्वामीने भी कहा है" तृष्णाचिषः परिदहन्ति न शान्तिरासामिष्टेन्द्रियार्थविभवः परिवृद्धिरेव । . स्थित्यव कायपरितापहरं निमित्तमित्यात्मवान् विषयसौख्यपराङ्मुखोऽ भूत् ॥ बृ. स्व. ८२. अर्थात् विषयतृष्णारूप अग्निकी ज्वालायें प्राणीको सब ओरसे जलाती हैं । इनकी शान्ति इन्द्रियविषयोंकी वृद्धिसे नहीं होती, बल्कि उससे तो वे और भी अधिक बढती हैं। यह उस तृष्णाका स्वभाव ही है। प्राप्त हुए इष्ट इन्द्रियविषय कुछ थोडे-से समयके लिए केवल शरीरके संतापको दूर कर सकते हैं । इस प्रकार विचार करके हे जितेन्द्रिय कुन्थु जिनेन्द्र ! आप चक्रवर्तीको भी विभूतिको छोडकर उस विषयजन्य सुखसे पराङ्मुख हुए हैं ॥४३॥ निकटमें जलप्राप्तिकी इच्छासे भूमिको खोदनेपर चट्टान प्राप्त हुई। तब प्रारम्भ किये हुए इस कार्यका -निर्वाह करते हुए उसने
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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