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________________ ॐ नमः सिद्धेभ्यः। गुणभद्र-देव-विरचितं आत्मानुशासनम् प्रभाचन्द्राचार्यकृत संस्कृतटीकासहितम् लक्ष्मीनिवासनिलयं विलीनविलयं निधाय हृदि वीरम् । आत्मानुशासनमहं वक्ष्ये मोक्षाय भव्यानाम् ॥ १॥ वीरं प्रणम्य भववारिनिधिप्रपोत मुद्योतिताखिलपदार्थमनरुपपुण्यम् । निर्वाणमार्गमनववगुणप्रबन्ध मात्मानुशासनपदं प्रवरं प्रदक्ष्ये ।। वृहद्धर्मभ्रातुलौकसेनस्य विषयव्यामुग्धबुद्धेः संबोधनव्याजेन सर्वसत्त्वोपकारक मन्मार्गमुपदर्शयितुकामो गुणभद्रदेवो निर्विघ्नतः शास्त्रपरिसमाप्त्यादिकं फलमभिलषनिष्टदेवताविशेषं नमस्कुर्वाणो लक्ष्मीत्याद्याह- अहं वक्ष्ये कथयिष्ये । कि तत् । आत्मानुशासनम् आत्मनः शिक्षादायक शास्त्रम् । किं कृत्वा । निधाय धृत्वा पत्र । हृदि हृदये। । कम् । वीरं विशिष्टाम् इन्द्राद्यसंभविनीम् ईम् अन्तरङगां बहिरङगां2 समवसरणानन्तचतुष्टयलक्षणां लक्ष्मी राति आदत्त इति वीरः अन्तिमतीर्थंकरः तीर्थंकरसमुदायो वा तम् । कथंभूतम् । लक्ष्मीनिवासनिलयं __ जो वीर जिनेंद्र लक्ष्मीके निवासस्थानस्वरूप हैं तथा जिनका पाप कर्म नष्ट हो चुका है उन्हें हृदयमें धारण करके मैं भव्य जीवोंको मोक्ष प्राप्तिके निमित्तभूत आत्मानुशासन अर्थात् आत्मस्वरूपकी शिक्षा देनेवाले इस ग्रंथको कहूंगा ॥ विशेषार्थ-- यहां प्रस्तुत ग्रन्थके कर्ता श्री गुणभद्राचार्यने ग्रन्थके प्रारम्भमें अन्तिम तीर्थंकर श्री वर्धमान जिनेंद्रका स्मरण करके उस आत्मानुशासन ग्रन्थके रचनेकी प्रतिज्ञा की है जो भव्य जीवोंको आत्माके यथार्थ स्वरूपकी शिक्षा देकर उन्हें मोक्षकी प्राप्ति करा सके । यहां श्लोकमें मंगलस्वरूपसे जिसवीर'शब्दका प्रयोग किया गया है उससे अन्तिम तीर्थंकर श्री वर्धमान जिनेंद्रका तो स्पष्टतया बोध होता ही 1ज निधन हृदि धृत्वा का हृदये। 2 ज अन्तरंगबहिरङमां।
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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