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________________ आराधनासमुच्चयम् * ३४ है, साकार (ज्ञान) उपयोग से युक्त है, योग्य स्थिति और अनुभाग का धारी है, शुभलेश्या की वृद्धि से युक्त है, तीन करण की शुद्धि को करके - अन्तर करके जिसने मिथ्यादर्शन के तीन टुकड़े किये हैं ऐसा प्राणी अनन्त संसार के छेदक प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन को ग्रहण करता है। प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन सादि और अनादि दोनों ही मिथ्यादृष्टि प्राप्त कर सकते हैं। साप्तादन आदि शेष गुणस्थानवर्ती इस सम्यग्दर्शन के उत्पादक नहीं हैं। सम्यग्दर्शन के उत्पादक भव्य ही होते हैं, अभव्य नहीं; इसलिए 'भव्य' यह विशेषण दिया है। मिथ्यादृष्टि भव्य भी दो प्रकार के होते हैं - संज्ञी एवं असंज्ञी। इन दोनों में संज्ञी ही सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है, असंज्ञी नहीं। क्योंकि असंज्ञी में हेय - उपादेय का विचार करने की शक्ति नहीं है, और हेयोपादेय के विचार बिना सम्यग्दर्शन उत्पन्न नहीं हो सकता। संज्ञी प्राणी भी दो प्रकार के होते हैं - पर्याप्त और अपर्याप्त । अपर्याप्त सम्यग्दर्शन का उत्पादक नहीं है क्योंकि अपर्याप्त अवस्था में इन्द्रिय और मर के ही होने ३२ ६ सहा करने का सामर्थ्य नहीं है। लब्धिचतुष्टययुक्तः - यद्यपि सम्यग्दर्शन पाँच लब्धियों के अन्त में ही होता है अर्थात् करणलब्धि के अनन्तर ही सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति होती है, तथापि प्रथम चार लब्धियों के बाद ही करणलब्धि होती है। चार लब्धियाँ होने के बाद सम्यग्दर्शन हो भी सकता है और नहीं भी परन्तु पूर्व में चार लब्धियों का होना आवश्यक है। चार लब्धियों के नाम - क्षायोपशमिक लब्धि - संज्ञी पंचेन्द्रिय पद की प्राप्ति होना अथवा अशुभ कर्मों के अनुभाग की हानि होना। "पूर्वसंचित कर्मों के मल रूप पटल के अनुभाग स्पर्धक जिस समय विशुद्धि के द्वारा प्रतिसमय अनन्त गुणहीन होते हुए उदीरणा को प्राप्त किये जाते हैं, उसको क्षयोपशम लब्धि कहते हैं।" (धवल ६१.९-८३) "कषायों की मंदता वा शुभ कर्मों के अनुभाग की वृद्धि को विशुद्धि लब्धि कहते हैं।" "प्रत्येक समय अनन्तगुणितहीन क्रम से उदीरित अनुभाग स्पर्धकों से उत्पन्न हुए साता आदि शुभ कर्मों के बंध के निमित्तभूत और असाता आदि अशुभ कर्मों के बंध के विरोधी, जो जीव के परिणाम है, उसे विशुद्धि कहते हैं। उसकी प्राप्ति को विशुद्धि लब्धि कहते हैं।" (धवल ६/१-९) छह द्रव्यों और नौ पदार्थों के उपदेश का नाम देशना है। उस देशना से परिणत आचार्य आदि की उपलब्धि को और उनके द्वारा उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण, धारण तथा विचारण की शक्ति के समागम को देशना लब्धि कहते हैं।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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