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________________ आराधनासमुच्चयम् * २८३ जो वसतिका और आहार दोनों देता है, उस पर बहुत उपकारी होने से मुनिराज का स्नेह होना सम्भव है। अत: साधुजन शय्याधर का (क्सतिका देने वाले का) आहार भी नहीं लेते हैं। कोई आचार्य कहते हैं कि मार्ग में विहार करते हुए साधु रात्रि में जिसके घर शयन करते हैं, दूसरे दिन उसके घर का भोजन नहीं करते, उसे शय्याधर पिण्डत्याग कहते हैं। यह भी आचार्य का एक गुण है। (१२) अराजभुक्-राजपिण्डाभोजी - राजा तथा राजा के सदृश महाऋद्धि वाले राजमंत्री आदि के घर का आहार आदि ग्रहण नहीं करना अराजभुक् गुण कहलाता है। राजपिण्ड के ग्रहण करने से आत्मजन्य और परजन्य दो दोष उत्पन्न होते हैं। आत्मजन्य दोष - राजकुल में मुनि आहार की यथार्थ शोधना नहीं कर सकते । परदे में लाये हुए तथा आहुत आहार को भी ग्रहण करना पड़ता है। असः शास्त्रविरुत आहार ग्रहण करने से विकृति तथा इंगाल आदि दोष उत्पन्न होते हैं। जिसने गृहस्थ अवस्था में ऐश्वर्य का अनुभव नहीं किया है, ऐसा साधु राजभवन की बहुमूल्य मनोहर रत्नादि सम्पत्ति को तथा देवाङ्गना के समान सुन्दर ललनाओं को क्रीड़ा करती हुई देखकर विकार को प्राप्त हो सकता है तथा अनुपम सुन्दरियों व ऐश्वर्य को देखकर निदान बन्ध भी सम्भव है। परजन्य दोष - मनुष्यकृत और तिर्यंचकृत के भेद से ये दो प्रकार के होते हैं। राजभवन में निर्दय, पापी, दासी-दास रहते हैं, अत: उनके कारण राजकुल में प्रवेश करना कठिन है। यदि प्रवेश ही भी जाये तो मदिरापान से मतवाले दासी-दास आदि मुनिराज का उपहास करते हैं, दुर्वचन बोलते हैं या आगे जाने से रोक देते हैं। काम से पीड़ित हुई स्त्रियाँ मुनि को देखकर हाव-भाव, विभम्र करती हैं, जिससे मुनि का चित्त विचलित हो जाने की सम्भावना है। राजधर में रत्न, सुवर्ण आदि इधर-उधर पड़े रहते हैं। उसे दूसरे लोग चुराकर मुनिजन को दोष लगा सकते हैं कि यहाँ पर मुनिराज आये थे वे ही ले गये होंगे। ये मनुष्यकृत परजन्य दोष हो सकते हैं। राजपिण्ड ग्रहण करने से तिर्यंचकृत परजन्य दोष भी होता है। वह तिर्य:शकृत परजन्य दोष दो प्रकार का है - ग्राम्य पशुकृत और वन्य पशुकृत । ग्रामीण दुष्ट प्रकृति वाले हाथी, घोड़े, गाय, बैल, भैंसा, कुत्ता आदि राजाओं के घर में निवास करते हैं। किसी कारणवश इनके बन्धन से छूट जाने पर संयमी मुनि का घात हो सकता है। राजभवन के पिंजरों में रहने वाले व्याघ्र, सिंह आदि दुष्ट जीवों से संयमी के प्राणों का संहार होने की संभावना है। भागते हुए वानर आदि प्राणियों से भी संयमी को पीड़ा हो सकती है, ये पशुकृत परजन्य दोष हैं। राजपिण्ड ग्रहण करने में इन दोषों की सम्भावना है, इसलिए राजपिण्डत्याग आचार्य का गुण कहा है। सर्वथा राजपिण्ड का त्याग नहीं हो सकता है क्योंकि सभी तीर्थकर सर्वप्रथम राजाओं के घर में ही आहार करते हैं। श्रीमती और वज्रजंघ ने मुनिराज को आहार दिया था, और भी कितने ही राजाओं ने मुनिराजों को आहार देकर पुण्यबंध किया है।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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