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________________ आराधनासार-२४ तपोदर्शनज्ञानचरणसमवायः॥ आदौ तपोग्रहणमपि छंदःपूरणाय तपश्च दर्शनं च ज्ञानं च चरणं च तपोदर्शनज्ञानचरणानि एतेषां समवायः समुदायस्तपोदर्शनज्ञानचरणसमवाय: तपोदर्शनज्ञानचरणान्येतानि चत्वार्यपि अस्मिन्नेवाराधनासारे समवेतान्यवकाशमतिजातानि ततस्तपोदर्शनज्ञानचरणसमवाय इति सम्यग्लक्षणमाराधनासारस्य भवति । अथायमभेदः सभेदो वेत्याशंकायां विभागं सूचयति। उत्तो उक्तः। कोऽसौ यः। स आराधनासारः। कतिभेदः। दुम्भेओ द्विभेदः द्वौ भेदौ यस्यासौ द्विभेदः। कौ तावित्याह । ववहारो एको व्यवहारः परमट्ठो एकश्च परमार्थः व्यवहाराराधनासारः परमार्थाराधनासार इत्यर्थः इति योजनिकाद्वारः । तपोदर्शनज्ञानचरणसमवाय आराधनासारो भवति स व्यवहारः परमार्थश्चैवेति विभेद उक्तः इति संक्षेपान्वयद्वारः । इत्याराधनासारलक्षणविभागप्रतिपादक द्वितीयं गाथासूत्रं गतं॥२॥ अथादावुद्दिष्टस्य प्रथमभेदस्य व्यवहाराराधनासारस्य लक्षणं सविभागं प्रतिपादयति- ववहारेण य सारो भणिओ आराहमाचक्कस्स । - दसणणाणचरित्तं तवो य जिणभासियं णूणं ॥३॥ व्यवहारेण च सारो भणित आराधनाचतुष्कस्य । दर्शनज्ञानचरित्रं तपश्च जिनभाषितं नूनम् ।।३।। भणिओ भणितः प्रोक्तः। कोऽसौ। सारो सार; रहस्यो धारः। कस्य आराहणाचउक्तस्स आराधनाचतुष्कस्य। केन। ववहारेण व्यवहारेण व्यवहरण व्यवहारः यथोक्तक्रियाचारस्तेन चकारोनुक्तसमुच्चयार्थः तेन परमात्माध्यानावस्थायां निश्चयेन च। यदुक्तं तप, दर्शन, ज्ञान और चारित्र का समवाय-समुदाय तप-दर्शन-ज्ञान और चारित्र का समवाय कहलाता है। इन चारों के समवाय का इस आराधनासार में कथन किया गया है। दर्शन, ज्ञानादि आराधना की समीचीनता ही सार है। इस आराधनासार के निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा दो भेद हैं अर्थात् व्यवहार आराधनासार और निश्चय आराधनासार। इस प्रकार निश्चय और व्यवहार रूप आराधना का भेद करने वाली दूसरी गाथा पूर्ण हुई ॥२॥ ___ अब पहले उद्दिष्ट, प्रथम भेद वाली व्यवहार आराधना का लक्षण तथा उसके विभाग का प्रतिपादन करते हैं व्यवहार नय से आराधनाचतुष्क का सार-जिनभाषित दर्शन, ज्ञान, चरित्र और तप कहा गया है |॥३॥ सार, रहस्य और धार ये सब एकार्थवाची हैं। चार आराधना का सार वा रहस्य आराधनासार है। यह यथोक्त क्रियाचार व्यवहार नयसे आराधनासार है। 'च' शब्द अनुक्त समुच्चय अर्थ के लिए है। इसलिए निश्चय नय से परमात्मा का ध्यान ही आराधना है। सो ही कहा है
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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