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________________ अन्तर्द्वन्द्वों के पार छोटी हो, घोड़ा पर्वत से भी विशाल हो, घेरा पृथ्वी जैसा बड़ा ही क्यों न हो, इन्द्रराज को सन्तोष नहीं होगा तब तक जब तक वह आठ या दस चक्र पूरे न कर ले। श्रुतज्ञ : आश्चर्य है ! वाग्मी : वास्तव में शिलालेख में तो कन्दुक-क्रीड़ा का वर्णन और भी विस्तार से है-चौदहवें पद्य से चौबीसवें पद्य तक । पुराविद : सच बात तो यह है कि श्रवणबेल्गोल के शिलालेख ही इतने महत्त्वपूर्ण हैं, सभी दृष्टियों से-धर्म, दर्शन, इतिहास, कला, साहित्य, आचारव्यवहार, सामाजिक दिग्दर्शन, काव्यमाधुरी, भाषाओं का समागम, कि अनेक विद्वान् वर्षों तक इनका अध्ययन करें तो अनेक-अनेक शोध ग्रन्थ तैयार हो जायें। श्रुतज्ञ : हमने कितनी बातों की चर्चा की । मन होता है कि इस चर्चा के समा हार में हम सब शिलालेखों में से एक-एक श्लोक का पाठ करें। पहले मैं पढ़ता हूँ नागसेनमनघं गुणाधिकं नागनायकजितारिमण्डलम् । राजपूज्यममलश्रीयान्पवं कामदं हतमदं नमाम्यह ॥ वाग्मी : यवत्पदाम्बुजनतावनिपालमौलि रत्नांशवोऽनिशममु विदषुः सरागम् । यवन्न वस्तु न वधून च वस्त्रजातं नो यौवनं न च बलं न च भाग्यमितम् ॥ अनुगा : श्रीमत्परमगम्भीर-स्याबावामोघलांछने । जीयात् त्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनम् ॥ पुराविद् : संसारवनमध्येऽस्मिनस्तदगान् जन-अमान् । आलोक्यालोक्य सद्वृत्तान् छिनत्ति यमतक्षकः॥
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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