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________________ ५२० आदिपुराणम् गर्मान्वय क्रिया- एक विशेष सर्पिणी युगमें बारह-बारह जातिब्राह्मण- तप और श्रुतसे प्रकारको क्रिया, इसके ५३ . होते हैं। भरतक्षेत्रका पहला रहित नाम मात्रके ब्राह्मण भेद होते हैं । ३८१५१ चक्रवर्ती भरत था जो कि . जातिब्राह्मण है ३८।४५ गार्हपत्य- जिस अग्निसे तीर्थंकर प्रथम तीर्थकर वृषभदेवका जिनरूपता- गर्भावय क्रियाका के मृत शरीरका दाह पुत्र था २६।१ एक भेद ३८५७ संस्कार होता है वह अग्नि चक्रलाभ- गर्भान्वय क्रियाका जीव- जानने देखने की शक्तिसे ४०१८४ एक भेद ३८।६१ युक्त जीव द्रव्य ३४।१९२ गुप्तित्रयी-१ मनोगुप्ति, २ वचन- चकामिषेक- गर्भान्वय क्रियाका ज्ञातृधर्मकथा- द्वादशाङ्गका गुप्ति, ३ कायगुप्ति ३६। एक भेद ३८।६२ .. छठवाँ भेद ३४।१४० १३८ चतुर्गति- नरक, तिर्यंच, मनुष्य गुरुपूजोपलम्भन- गर्भान्वय और देव ये चार गतियाँ तक्षन्- चक्रवर्तीका एक सचेतन क्रियाका एक भेद ३८।६१ हैं । ४२।९३ रत्त ३७१८४ गुरुस्थानाभ्युपगम- गर्भान्वय चतुर्दश महाविद्या- उत्पादपूर्व तद्विहार-गर्भान्वय क्रियाका एक क्रियाका एक भेद ३८१५८ आदि चौदह पूर्व ३४।१४७ भेद ३८।६२ गृहत्याग- गर्भावय क्रियाका तप- इच्छाका निरोध करना तप चतुर्मुखमह- पूजाका एक भेद, एक भेद ३८।५७ है। इसके बारह भेद है महामुकुटबद्ध राजाओंके गृहपति- चक्रवर्तीका एक सचे द्वारा यह की जाती है। १ अनशन, २ ऊनोदर, ३ तन रत्न ३७१८४ वृत्ति परिसंख्यान, ४ रस इसका दूसरा नाम सर्वतोगृहिमूलगुणाष्टक-गृहस्थके आठ परित्याग, ५ विविक्तभद्र है ३८।२६ मूलगुण-१ मद्यत्याग, २ शय्यासन, ६ कायक्लेश, ७ चतुर्भेद ज्ञान- मतिज्ञान, श्रुतमांसत्याग, ३ मधुत्याग, ज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय प्रायश्चित्त,८ विनय,९ वैया४ अहिंसाणुव्रत, ५.सत्याणु वृत्य, १० स्वाध्याय, ११ ज्ञान ३६।१४५ व्रत, ६ अचौर्याणुव्रत, ७ व्युत्सर्ग और १२ ध्यान ब्रह्मचर्याणुव्रत और ८ परिचमूपति- सेनापति, चक्रवर्तीका ३८।४१ ग्रहपरिमाणाणुव्रत ४६। एक सजीव रत्न ३७१८४ तप ऋद्धि- इसके उग्रोग्रतप, चर्म- चक्रवर्तीका एक निर्जीव २६९ दीप्ततप, घोरतप आदि गृहीशिता- गर्भान्वय क्रियाका रत्न ३७१८४ अनेक भेद है ३६।१४९चर्या- मन्त्र, देवता, औषध एक भेद ३८।५७ १५१ तथा आहार आदिके लिए तीर्थ- तीर्थकरका प्रवृत्तिकाल हिंसा नहीं करूँगा ऐसी घातिकर्म- ज्ञानावरण, दर्शना ३४।१४२ वरण, मोहनीय और अन्त प्रतिज्ञा धारण करना ३९। तीर्थकृद्भावना-गर्भावय क्रिया १४५-१४७ राय ये चार घातियाकर्म का एक भेद ३८।५७ कहलाते हैं । ३३।१३० चातुराश्रम्य- ब्रह्मचर्य, गृहस्था तिथ्यादिपञ्च-तिथि, ग्रह, नक्षत्र, श्रम, वानप्रस्थ और संन्यास योग और करण ४५।१७९ ये चार आश्रम हैं। ३९:२४ चक्रधर- चक्रवर्ती भरत । भरत, त्याग- विकार भावोंको छोड़ना ऐरावत और विदेह क्षेत्रमें चार आराधना- १ सम्यग्दर्शन, ३६।१५७ चक्रवर्ती होते हैं। ये षट् २ सम्यग्ज्ञान, ३ सम्यक् . अस-चलने-फिरनेवाले जीव खण्ड भूमण्डलके स्वामी चारित्र और सम्यक् तप ये द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिहोते हैं। इन्हें देवोपनीत चार आराधना है ४७१४०० न्द्रिय, पंचेन्द्रिय ३४।१९४ चक्ररत्न प्राप्त होता है। त्रिगौरव- १रस गौरव, २ शब्दये दश कोडाकोड़ी सागरके जाति- माताकी. अन्वय शुद्धि गौरव, ३ ऋद्धिगौरव, अवसर्पिणी तथा उत्- ३९।८५ गौरव = अहंकार ३६।१३७
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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