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________________ सप्तचत्वारिंशत्तम पर्व ४६५ राजराजस्तदा भूरिविभूत्याऽभ्येत्य तं' मुदा । श्रीपालः पूजयित्वा तु श्रुत्वा धर्मद्वयात्मकम् ॥१८६॥ ततः स्वभावसंबन्धमप्राक्षीत् प्रश्रयाश्रयः । भगवांश्चेत्युवाचेति कुरुराज सुलोचना ॥१०॥ निवेदितवती पृष्टा मृष्टवाक सौष्टवान्विता । विदह पुण्डरीकिण्यां यशःपालो महीपतिः ॥११॥ तत्र सर्वसमृद्धाख्यो वणिक् तस्य मनःप्रिया । धनञ्जयानुजाताऽसौ धनश्रीर्धनवर्द्विनी ॥१६॥ तयोस्तु सर्वदयितः श्रेष्टी तद्भगिनी सती । संज्ञया सर्वदयिता श्रेष्टिनश्चित्तवल्लभे ॥१९३॥ सुता सागरसेनस्य जयसेना समाया । धनञ्जयवणीशस्य जयदत्ताभिधाऽपरा ॥१६॥ देवश्रीरनुजा श्रेष्टि पितुस्तस्यां तनूद्भवौ । जातौ सागरसेनस्य सागरी दत्तवाक्परः ॥१५॥ ततः समुद्रदत्तश्च सह सागरदत्तया। सुतौ "सागरसेनानुजायां जातमहोदयौ ॥१६६॥ जातौ "सागरसेनायां दत्तो वैश्रवणादिवाक् । दत्ता वैश्रवणादिश्च दायादः श्रेष्टिनः स तु ॥ भार्या सागरदत्तस्य दत्ता' वैश्रवणादिका । सती समुद्रदत्तस्य"सा सर्वदयिता' प्रिया ॥१६८॥ सा वैश्रवणदत्तेष्टा दत्तान्ता" सागराया । तेषां २ २"सुखसुखेनैवं काले गच्छति संततम् ॥१९९॥ यशःपालमहीपालमावर्जितमहाधनः । वणिग्धनञ्जयोऽन्येद्युः सद्रत्नैर्दर्शनीकृतैः ॥२०॥ उन्हींका पहला गणधर हुआ ॥१८८। उसी समय राजाधिराज श्रीपालने बड़ी विभूतिके साथ आकर गुणपाल तीर्थ करकी पूजा की और गृहस्थ तथा मुनिसम्बन्धी-दोनों प्रकारका धर्म सुना । तदनन्तर बड़ी विनयके साथ अपने पूर्वभवका सम्बन्ध पूछा, तब भगवान् इस प्रकार कहने लगे - यह सब बातें मधुर वचन बोलनेवाली सुन्दरी सुलोचना महाराज जयकुमारके पूछनेपर उनसे कह रही थी। उसने कहा कि - विदेह क्षेत्रकी पुण्डरीकिणी नगरीमें यशपाल नामका राजा रहता था ॥१८९-१९१।। उसी नगरमें सर्वसमृद्ध नामका एक वैश्य रहता था। उसकी स्त्रीका नाम धनश्री था जो कि धनको बढ़ानेवाली थी और धनंजयकी छोटी बहिन थी। उन दोनोंका पुत्र सर्वदयित सेठ था, उसकी बहिनका नाम सर्वदयिता था जो कि बड़ी ही सतो थी। सर्वदयितकी दो स्त्रियाँ थीं, एक तो सागरसेनकी पुत्री जयसेना और दूसरी धनंजय सेठकी पुत्री जयदत्ता ॥१९२-१९४।। सेठ सर्वदयितके पिताकी एक छोटी बहिन थी जिसका नाम देवश्री था और वह सेठ सागरसेनको ब्याहो थी। उसके सागरदत्त और समुद्रदत्त नामके दो पुत्र थे तथा सागरदत्ता नामकी एक पुत्री थी। सागरसेनकी छोटी बहिन सागरसेनाके दो सन्तानें हुई थीं - एक वैश्रवणदत्ता नामकी पुत्री और दूसरा वैश्रवणदत्त नामका पुत्र । वैश्रवणदत्त सेठ सर्वदयितका हिस्सेदार था ॥१९५-१९७॥ वैश्रवणदत्ता सेठ सागरदत्तकी स्त्री हुई थी, सेठ समुद्रदत्त की स्त्रीका नाम सर्वदयिता था और सागरदत्ता सेठ वैश्रवणदत्तको ब्याही गयी थी। इस प्रकार उन सबका समय निरन्तर बड़े प्रेमसे व्यतीत हो रहा था ॥१६८-१६४।। जिसने बहुत धन उपार्जन किया है ऐसे सेठ धनंजयने किसी दिन अच्छे-अच्छे रत्न भेंट देकर राजा यशपालके दर्शन किये १ गुणपालकेवलिनम् । २ जयकुमारम् । ३ भगिनी। ४ पुत्रः। ५ राजश्रेष्ठी। ६ धनंजयनामवैश्यस्य । ७ द्वितीया। ८ सर्वदयितश्रेष्ठिजनकसर्वसमृद्धस्य । ९ पुत्रौ। १० देवश्रियोर्भर्तुगिन्याम् । ११ सर्वसमृद्धस्य भार्यायाम् । १२ दत्ता अ०, प०, इ०, स०, ल० । १३ दत्तो ल०, ५०, इ०, अ०, स०। १४ ज्ञातिः । १५ सर्वदयितश्रेष्टिनः । १६ वैश्रवणदत्तः । १७ सागरसेनस्य ज्येष्ठपुत्रस्य । १८ वैश्रवणदत्ता। भार्याऽभूदिति सम्बन्धः । १९ सागरसेनस्य कनिष्ठपुत्रस्य । २० सर्वदयितश्रेष्ठिनो भगिनीप्रिया । भार्या जातेति संबन्धः । २१ समुद्रदत्तस्यानुजा सागरदत्ताया। वैश्रवणदत्तस्येष्टा बभूवेति संबन्धः । २२ समुद्रादीनाम्। २३ अकृच्छे ण, अत्यन्तसुखेनेत्यर्थः । २४ आनीत । २५ उपायनीकृतैः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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