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________________ षट्चत्वारिंशत्तमं पर्व ४७१ दातुं समुद्रदत्तस्य निश्शक्तेरातपे क्रुधा । परिवर्द्धितदुर्गन्धधूमान्तर्वर्तिनश्चिरम् ॥२७॥ निरोधममयोद्धोषणायामानन्ददेशनात् । अङ्गकस्य नृपोरभ्रवातिनः करखण्डनम् ॥२८॥ आनन्दराजपुत्रस्य तद्भुक्त्याऽवस्कराशनम् । मद्यविक्रयणे बालं कंचिदाभरणेच्छया ॥२८१॥ हत्वा भूमौ विनिक्षिप्तवत्यास्तत्संविधानकम् । प्रकाशितवती स्वात्मजे शुण्डायाश्च निग्रहम् ॥२२॥ पापान्येतानि कर्माणि पश्यन् हिंसादिदोषतः । अत्रामुत्र च पापस्य परिपाकं दुरुत्तरम् ॥२८३॥ अवधार्यानभिप्रेतव्रतत्यागो भवाद् भयात् ।' भ्रषमोषमृषायोषाश्लेषहिंसादिदृषिताः ॥२८४॥ नात्रैव किन्त्वमुत्रापि ततश्चित्रवधोचिताः । अस्माकमपि दौर्गत्यं' प्राक्तनात् पापकर्मणः ॥२८५॥ इदं तस्मात् समुच्चेयं पुष्पं सच्चेष्टितैः पुरु । इति तं मोचयित्वाऽग्रहीषं दीक्षां मुमुक्षया ॥२८६॥ सद्यो गुरुप्रसादेन सर्वशास्त्राब्धिपारगः । विशुद्धमतिरन्येद्युः समीपे सर्ववेदिनः ॥२७॥ मदृष्टपूर्वजन्मानि समश्रौषं यथाश्रुतम् । कथयिष्याम्यहं तानि कर्नु वां कौतुकं महत् ॥२८८॥ इहैव पुष्कलावत्यां विषये पुण्डरीकिणीम् । परिपालयति" प्रीत्या वसुपालमहीभुजि ॥२८१॥ विद्युद्वेगाह्वयं चोरमवष्टभ्य करस्थितम् । धनं स्वीकृत्य शेषं च भवता दीयतामिति ॥२९॥ दी जा रही है और वह विलाप कर रहा है। आगे जानेपर देखा कि सागरदत्तने जुआमें समुद्रदत्तका बहुत-सा धन जीत लिया था परन्तु समुद्रदत्त देने में असमर्थ था इसलिए उसने क्रोधसे उसे बहुत देर तक दुर्गन्धित धुआँके बीच धूप में बैठाल रखा है, किसी जगह देखा कि आनन्द महाराजकी अभय घोषणा कराये जानेपर भी उनके पुत्र अंगकने राजाका मेढ़ा मारकर खा लिया है इसलिए उसके हाथ काटकर उसे विष्ठा खिलाया जा रहा है और अन्य स्थानपर देखा कि मद्य पीनेवाली स्त्रीने मद्य खरीदनेके लिए आभूषण लेनेकी इच्छासे किसी बालकको मारकर जमीनमें गाड़ दिया था, वह यह समाचार अपने पुत्रसे कह रही थी कि किसी राज कर्मचारीने उसे सुन लिया इसलिए उसे दण्ड दिया जा रहा है। हिंसा आदि दोषोंसे उत्पन्न हुए इन पाप कार्योंको देखकर मैंने निश्चय किया कि पापका फल इस लोक तथा परलोक दोनों ही जगह बुरा होता है। मैंने संसारके भयसे व्रत छोड़ना उचित नहीं समझा । मैं सोचने लगा कि हिंसा, झूठ, चोरी, परस्त्रीसेवन आदिसे दूषित हुए पुरुषोंको इसी जन्ममें अनेक प्रकारके वध-बन्धनका दुःख भोगना पड़ता हो सो बात नहीं किन्तु परलोकमें भी वहो दुःख भोगने पड़ते हैं, हमारी यह दरिद्रता भी तो पहलेके पापकर्मोसे मिली है, इसलिए सदाचारी पुरुषोंको इस पुण्यका अधिकसे अधिक संचय करना चाहिए यह सोचकर मैंने अपने पिताको छोड़कर मोक्षकी इच्छासे दीक्षा धारण कर ली है ।। २७२-२८६ ।। गुरुके प्रसादसे मैं शीघ्र ही सब शास्त्ररूपी समुद्रका पारगामी हो गया और मेरी बुद्धि भो विशुद्ध हो गयी। किसी अन्य दिन मैंने सर्वज्ञ देवके समीप दोषोंसे भरे हुए अपने पूर्वजन्म सुने थे सो उसीके अनुसार आप लोगोंका बड़ा भारी कौतुक करनेके लिए उन्हें कहता हूँ ॥ २८७-२८८ ॥ इसी पकलावती देशकी पण्डरीकिणी नगरीको राजा वसपाल बडे प्रेमसे पालन करते थे ।। २८९ ॥ किसी एक दिन कोतवालने विद्युद्वेग नामका चोर पकड़ा, उसके हाथमें जो धन था उसे लेकर कहा कि बाकीका धन और दो, धन न देनेपर रक्षकोंने उसे दण्ड दिया तब उसने १ घोषणायां सत्याम् । २ आनन्दाख्यनृपस्य निदेशनात् । ३ एलक( एडक )घातकस्य । ४ तद्भुक्त्वा इत्यपि पाठः । ५ गूथभक्षणम् । ६ मद्यव्यवहारनिमित्तम् । ७ बालघातिन्याः सुते । ८ मद्यपायिन्याः । ९ अनिष्टो व्रतत्यागो यस्य अननुमतव्रतत्याग इत्यर्थः । १० हिंसाचौर्यानृतभाषाब्रह्मबहुपरिग्रहः । रोषमोषमृषायोषा हिंसादिश्लेषादि"ल०। ११ दारिद्रयम् । १२ मोक्तुमिच्छया । १३ सर्वज्ञस्य । १४ शृणोमि स्म । १५ युवयोः । १६ रक्षति सति । १७ बलात्कारेण गृहीत्वा ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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