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________________ ४३८ आदिपुराणम् तरन्तं मकराकारं मध्येहदमिमाधिपम् । देवी कालीति पूर्वोक्ता सरय्वाः सङ्गमे ऽग्रहीत् ॥१४॥ 'नक्राकृत्या स्वदेशस्थः क्षुद्रोऽपि महतां बली । दृष्ट्वा गतं निमज्जन्तं प्रत्यागत्य तटे स्थिताः ॥१४५॥ ससंभ्रमं सहापेतुः हदं हेमाङ्गदादयः । सुलोचनाऽपि तान्वीक्ष्य कृतपञ्चनमस्कृतिः ॥१४६॥ मन्त्रमूर्तीन् समाधाय हृदय भक्तितोऽहंतः । उपसर्गापसर्गान्तं त्यक्ताहारशरीरिका ॥१७॥ प्राविशद् बहुभिः साधं गङ्गां गङ्गेव देवता । गङ्गापातप्रतिष्ठानगङ्गाकूटाधिदेवता ॥१८॥ बिबुध्यासनकम्पेन कृतज्ञाऽऽगत्य सत्वरम् ।''तदानयत्तरं सर्वान् संतयं खलकालिंकाम् ॥१४९॥ स्वयमागत्य केनात्र रक्षन्ति कृतपुण्यकान् । गङ्गातटे विकृत्याशु भवनं सर्वसंपदा ॥१५०॥ मणिपीठे समास्थाप्य पूजयित्वा सुलोचनाम् । तव दत्तनमस्काराजज्ञे गङ्गाधिदेवता ॥१५॥ त्वत्प्रसादादिदं सर्वमवरुद्धामरेशिनः । तयेत्युक्ते जयोऽप्येतत् किमित्याह सुलोचनाम् ॥१५॥ उपविन्ध्यादि विख्यातो विन्ध्यपुर्यामभूद् विभुः। विन्ध्यकेतुः प्रिया तस्य प्रियङ्गश्रीस्तयोः सुता।१५३। वह हाथी पानीमें चलने लगा, उस समय उसकी सुंडका अग्रभाग ऊंचा उठा हआ था, दाँत चमक रहे थे, गण्डस्थल पानीके ऊपर था और आकार मगरके समान जान पड़ता था, इस प्रकार तैरता हुआ हाथी एक गढ़ेके बीच जा पहुँचा। उसी समय दूसरे सर्पके साथ समागम करते समय जिस सर्पिणीको पहले जयकुमारके सेवकोंने मारा था और जो मरकर काली देवी हुई थी उसने मगरका रूप धरकर जहाँ सरयू गंगा नदीसे मिलती है उस हाथीको पकड़ लिया सो ठीक ही है क्योंकि अपने देशमें रहनेवाला क्षुद्र भी बड़ों-बड़ोंसे बलवान हो जाता है। हाथीको डूबता हुआ देखकर कितने ही लोग लौटकर किनारेपर खड़े हो गये परन्तु हेमांगद आदि घबड़ाकर उसी गढ़ेमें एक साथ घुसने लगे। सुलोचनाने भी उन सबको गढ़े में घुसते देख पंच नमस्कार मन्त्रका स्मरण किया, उसने मन्त्रकी मूर्तिस्वरूप अर्हन्त भगवान्को बड़ी भक्तिसे अपने हृदयमें धारण किया और उपसर्गकी समाप्ति तक आहार तथा शरीरका त्याग कर दिया ॥१४२-१४७॥ सुलोचना भी अनेक सखियोंके साथ गंगामें घुस रही थी और उस समय ऐसी जान पड़ती थी मानो गंगादेवी ही अनेक सखियोंके साथ गंगा नदीमें प्रवेश कर रही हो। इतनेमें ही गंगाप्रपात कुण्डके गंगाकूटपर रहनेवाली गंगादेवीने आसन कम्पायमान होनेसे सब समाचार जान लिया और किये हुए उपकारको माननेवाली वह देवी बहुत शीघ्र आकर दृष्ट कालिका देवीको डाँटकर उन सबको किनारेपर ले आयी ॥१४८-१४९॥ सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें ऐसे कौन हैं जो पुण्य करनेवालोंको स्वयं आकर रक्षा न करें। तदनन्तर उस देवीने गंगा नदीके किनारेपर बहुत शीघ्र अपनी विक्रिया-द्वारा सब सम्पदाओंसे सुशोभित एक भवन बनाया, उसमें मणिमय सिंहासनपर सुलोचनाको बैठाकर उसकी पूजा की और कहा कि तुम्हारे दिये हुए नमस्कार मन्त्रसे ही मैं गंगाकी अधिष्ठात्री देवी हुई हूँ, और सौधर्मेन्द्रकी नियोगिनी भी हूँ, यह सब तेरे ही प्रसादसे हुआ है ! गंगादेवीके इतना कह चुकनेपर जयकुमारने भी सुलोचनासे पूछा कि यह क्या बात है ? ।।१५०-१५२।। सुलोचना कहने लगी कि विन्ध्याचल पर्वतके समीप विन्ध्यपुरी नामकी नगरीमें विन्ध्यकेतु नामका एक सिद्ध १. तरतीति तरन् तम् । २ ह्रदस्य मध्ये । ३ पूर्वस्मिन् भवे जयेन सह बने धर्म श्रुतवत्या नाग्या सह स्थितविजातीयसहचरो। ४ सरयूनद्याः। ५ गङ्गाप्रदेशस्थाने। ६ कुम्भोराकारेण। 'नक्रस्तु कुम्भोरः' इत्यभिधानात् । ७ अभिमुखमागत्य । ८ हदे प्रविष्टवन्तः । ९ उपसर्गावसानपर्यन्तम् । १० गङ्गापतनकुण्डस्थान । ११ तानाल०, इ०, अ०, स०, प० । १२ निर्माय । १३ त्वया वितीणपंचनमस्कारपदात् । १४ अभूवम् । १५.विलासिनी (नियोगिनीति यावत् ) । १६ गङ्गादेव्या। १७ जयकुमारोऽप्येतत् किमिति पृष्टवान् । १८ विन्ध्याचलसमीपे ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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