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________________ आदिपुराणम् पुत्रबन्धुपदातीनामपराधशतान्यपि । क्षमन्ने हि महात्मानस्तद्वि तेषां विभूषणम् ॥ १२ ॥ भवेहेवादपि स्वामिन्यपराधविधायिनाम् । आकल्पमयशः पापं चानुबन्धनिबन्धनम् ॥ १३॥ अपराधः कुतोऽस्माभिरकोऽयमविवेकिभिः । वयं वो बन्धुभृत्यास्त कुमार क्षन्तुमर्हसि ॥ १४ ॥ एषा कीर्तिरघं चैतत् प्रसादात्ते प्रशाम्यति । शापानुग्रहयोः शक्तस्त्वं विशुद्धिं विधेहि नः ॥ १५॥ अणालोकनारोधि हन्यते जगतस्तमः । अस्माकं स भवानर्कस्तस्मादन्तस्तमो हरेत ॥ ६॥ प्रातिकृल्यं तवास्मासु स्तन्यस्व स्तनधय । अस्मजन्मान्तरा दृष्टपरिपाकविशेषतः ॥ १७ ॥ विश्वविश्वम्भराहादी यदि क्षिपति वारिदः । कदाऽप्यशनिमेक स्मिस्तत्तस्यैवाशुभोदयः ॥ १८ ॥ हयेनेव दुरारोहाज्जयनेहासि पातितः । स ते प्रेष्यः किमत्रास्ति वैमनस्यस्य कारणम् ॥ १९ ॥ सुलोचनेति का वार्ता सर्वस्वं नस्तवैव तत् । निषिद्धश्चेत्त्वया पूर्व क्रियते किं स्वयंवरः ॥२०॥ लक्ष्मीमती गृहाणेमामक्षमालापराभिधाम् । निर्मलां वा यशोमालां किं ते 'पाषाणमालया ॥ २१॥ वंश दोनों ही आपके द्वारा बनाये गये हैं और आपके द्वारा ही बढ़ रहे हैं। विषका वृक्ष भी जिससे उत्पन्न होता है उससे फिर नाशको प्राप्त नहीं होता ।।११॥ महात्मा लोग पुत्र, बन्ध तथा पियादे लोगोंके सैकड़ों अपराध क्षमा कर देते हैं क्योंकि उनको शोभा इसी में है ।। १२ ।। औरोंकी वात जाने दीजिए जो देवके भी अधीन होकर स्वामीका अपराध करते हैं उनका अपयश कल्पान्त काल तक बना रहता है और उनका यह पाप भी अनेक दोषोंका बढ़ानेवाला होता है ॥१३॥ हम मूल्ने आपका यह एक अपराध किया है। चूंकि हम लोग आपके भाइयों और भृत्योंमें-से हैं इसलिए हे कुमार, यह अपराध क्षमा कर देने योग्य है ॥१४॥ यह हमारी अपकीर्ति और पाप आपके प्रसादसे शान्त हो सकता है क्योंकि आप शाप देने तथा उपकार करने-दोनोंमें समर्थ हैं इसीलिए हम लोगोंकी शुद्धता अवश्य कर दीजिए ॥१५॥ प्रकाशको रोकनेवाला संसारका अन्धकार सूर्यके द्वारा नष्ट किया जाता है परन्तु हमारे लिए तो आप ही सूर्य हैं इसलिए हमारे अन्तःकरणके अन्धकारको आप ही नष्ट कर सकते हैं ।।१६॥ पूर्वजन्मके पाप कर्मोंके विशेष उदयसे हम लोगोंके लिए जो आपका यह विरोध उपस्थित हुआ है वह मानो पुत्रके लिए माताके दूधका विरोध उपस्थित हुआ है। भावार्थ-जिस प्रकार माताके दूधके बिना पुत्र नहीं जीवित रह सकता है उसी प्रकार आपकी अनुकूलताके बिना हम लोग जीवित नहीं रह सकते हैं ॥१७॥ समस्त पृथिवीको आनन्दित करनेवाला बादल यदि कदाचित् किसी एक पर वज्र पटक देता है तो इसमें बादलका दोष नहीं है किन्तु जिसपर पड़ा है उसीके अशुभ कर्मका उदय होता है ॥१८॥ चढ़ना कठिन होनेसे जिस प्रकार घोड़ा किसीको गिरा देता है उसी प्रकार जयकुमारने आपको गिरा दिया है परन्तु वह तो आपका सेवक है इसमें बुरा माननेका कारण ही क्या है ? ॥१९॥ सुलोचना, यह कितनी-सी बात है ? हमारा जो सर्वस्व है वह आपका ही है। यदि आप पहले ही रोक देते तो स्वयंवर ही क्यों किया जाता ? ॥२०॥ जिसका दूसरा नाम अक्षमाला है ऐसी मेरी दूसरी पुत्री लक्ष्मीमतीको आप ग्रहण कीजिए। यह लक्ष्मीमती यशको मालाके समान निर्मल है, पाषाण (रत्नों) की मालासे आपको क्या प्रयो १ अलब्धलाभ. लब्धपरिरक्षणं रक्षितविवर्द्धनं चेत्यनुबन्धः ते एव निबन्धनं कारणं यस्य । २ युष्माकम् । ३ तत् कारणात् । ते द० । ४ स्तनक्षीरस्य । ५ शिशौ । यथा स्तनक्षीरस्य प्रातिकूल्यं शिशोर्जीवनाय न स्यात तथा तब प्रातिकूल्यमपि अस्माकम् । ६ अशुभकर्म । ७ एकस्मिन् पुंसि । ८ जयः । ९ तव किंकरः । १० स्वयंवरे क्षिप्तपापाणमालया। सुलोचनयाक्षिप्तरत्नमालया।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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