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________________ ४०४ आदिपुराणम् " १० चर्या नृत्यत्केतवो रथाः । जविभिर्व्याजिभिर्व्यूढा प्राधावन् विद्विषः प्रति ॥ १७७॥ निश्शेष हे तिपूर्णेषु रथेषु रथनायकाः । तुलां" "जगर्जुरारुह्य पिन्जरैः कुञ्जरारिभिः ॥ १७८ ॥ 'चक्रसंघट्टसंपिष्टशवासृग्मांसकर्दमे । रथकट्य (श्चरन्ति स्म 'तत्राब्धौ मन्दपोतवत् ॥१७६॥ कुन्ता सिप्रासचक्रादिसंकीर्णे वणितक्रमाः । अक्रामन् कृच्छ्रकृच्छ्रेण रणे रथतुरङ्गमाः ॥ १८० ॥ ता संनद्धसंयुक्तसर्वायुधभृतं रथम् । संक्रम्य २ वृषभं वाऽर्कः समारूढपराक्रमः ॥ १८१॥ पुरोश्चलत्ल मुस्स पंच्छरतीक्ष्णशुसंततिः । शत्रुसन्तमसं भिन्दन् बालार्कमजयज्जयः ॥ १८२॥ मण्डलासमुत्सृष्टदुष्टात्रः शस्त्रकर्मवित् । जयो भिषजमम्बैर्यः शत्रुशल्यं समुद्धरन् ॥ १८३॥ ध्वजस्योपरि धूमो वा तेनाकृष्टो " नु सायकः । पपात तापमापाच सूचयन्नशुभं द्विषाम् ॥ १८४ ॥ `वजदण्डान् समाखण्ड्य“विद्विषोऽन्वीतपौरुषान् । कुर्वन् सर्वान् स" निवंशान् सोमवंशध्वजायते ॥ १८५ ॥ विच्छिनकेतवः केचित् क्षणं तस्थुर्मृता इव । प्राणैर्न प्राणिनः किन्नु मानप्राणा हि मानिनः ॥ १८६॥ प्रज्वलन्तं "जयन्तं ते जयं तं सोदुमक्षमाः । सह सर्वेऽपि संपेतुरभ्यग्नि शलभा यथा ॥ १८७॥ १७ ** १४ १५ जिनमें जुते हैं ऐसे रथ चिरकाल में अपना नम्बर ( बारी ) पाकर शत्रुओंके प्रति दौड़ने लगे ॥ १७७॥ रथोंके स्वामी, सम्पूर्ण शस्त्रोंसे भरे हुए रथोंपर सवार हो पिंजरोंमें बन्द हुए सिंहों की तुलना धारण करते हुए गरज रहे थे || १७८ ।। उस युद्ध में पहियों के संघट्टनसे पिसे हुए मुरदों के खून और मांसकी कीचड़ में रथोंके समूह ऐसे चल रहे थे मानो किसी समुद्र में छोटी-छोटी नावें ही चल रही हों ।।१७६।। बरछा, तलवार, भाले और चक्र आदिसे भरे हुए युद्धक्षेत्र में घाय पैरोंवाले रथके घोड़े बड़े कष्टसे चल रहे थे ॥ १८० ॥ उसी समय तैयार हुए तथा जुड़े हुए सब' प्रकारके शस्त्रोंसे व्याप्त रथपर आरूढ़ होनेसे जिसका पराक्रम वृषभ राशिपर आरूढ़ हुए सूर्य के समान बढ़ रहा है, जिसके आगे चलते हुए बाणरूपी तीक्ष्ण किरणों का समूह प्रकाशमान हो रहा है और जो शत्रुरूपी अन्धकारका भेदन कर रहा है ऐसे उस जयकुमारने उदय होता हुआ बाल-सूर्य भी जीत लिया था ॥ १८१ - १८२ ॥ अथवा वह जयकुमार किसी अच्छे वैद्य या डाक्टरका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार वैद्य शस्त्रकी नोंकसे बिगड़ा हुआ खून निकाल देता है उसी प्रकार वह जयकुमार भी तलवारकी नोंकसे दुष्ट - शत्रुओं का खून निकाल रहा था, जिस प्रकार वैद्य शस्त्र चलानेकी क्रियाको जानता है उसी प्रकार वह जयकुमार भी शस्त्र चलानेकी क्रिया जानता था और वैद्य जिस प्रकार शल्यको निकाल देता है, उसी प्रकार जयकुमार भी शत्रुरूपी शल्यको निकाल रहा था ॥ १८३ ।। उसके द्वारा चलाये हुए बाण शत्रुओं को सन्ताप उत्पन्न कर अशुभकी सूचना देते हुए धूमकेतुके समान उनकी ध्वजाओं पर पड़ रहे थे || १८४ ॥ उस समय शत्रुओंकी ध्वजाओंके दण्डों को खण्ड-खण्ड कर सब शत्रुओंको पौरुषहीन तथा वंशरहित करता हुआ जयकुमार सोमवंशकी ध्वजाके समान आचरण कर रहा था || १८५ || जिनकी पताकाएँ छिन्न-भिन्न हो गयी हैं ऐसे कितने ही शत्रु क्षणभरके लिए मरे हुए समान खड़े थे सो ठीक ही है क्योंकि प्राणोंसे ही प्राणी नहीं गिने जाते किन्तु अभिमानी मनुष्य अभिमानको ही प्राण समझते हैं || १८६ | अच्छी तरह जलते हुए १ अवसरम् | 'पर्यायोऽवसरे क्रमे ' इत्यभिधानात् । २ प्राप्य । ३ विद्विषं प्रति ल० । ४ आयुध । ५ साम्यम् । ६ गर्जन्ति स्म । ७ पञ्जरः ल० । ८ रणे । ९ मन्दनौरिव । १० क्षतपादाः | ११ सज्जीकृतं । १२ संप्राप्य । १३ वृंपभराशिमिव । १४ करवालेन समुत्सृष्टदुष्टात्रः । १५ अनुगतवान् । ऋ गतौ लङि रूपम् । मन्वीयः ल० । १६ समुत्सृष्टः । १७ इव । १८ अनुगत । १९ जयः । २० न जीवन्ति । २१ जयतीति जयन् तम् । २२ 'अभिमुखमागताः । २३ अग्निमभि पतङ्गाः । २४ शलभा इव ल० ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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