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________________ ३४८ आदिपुराणम् प्रजानुपालनं प्रोक्तं पार्थिवस्य जितात्मनः । समञ्जसस्त्वमधुना वक्ष्यामस्तद्गुणान्तरम् ॥१६८॥ राजा चित्तं समाधाय यत्कुर्याद् दुष्टनिग्रहम् । शिष्टानुपालनं चैव तत्सामञ्जस्यमुच्यते ॥१९९॥ द्विषन्तमथवा पुत्रं निगृह्णन्निग्रहोचितम् । अपक्षपतितो दुष्टमिष्टं चेच्छन्ननागसम् ॥२०॥ मध्यस्थवृत्तिरेवं यः समदी समञ्जसः । समञ्जसत्वं तद्भावः प्रजास्वविषमेक्षिता ॥२०॥ गुणेनैतेन शिष्टानां पालनं न्यायाविनाम् । दुष्टानां निग्रहं चैव नृपः कुर्यात् कृतागसाम् ॥२०२॥ दुष्टा हिंसादिदोषेषु निरताः पापकारिणः । शिष्टास्तु शान्तिशौचादिगुणधर्मपरा नराः ॥२०३॥ वसन्ततिलकावृत्तम् इत्थं मनुः सकलचक्रभृदादिराजः तान् क्षत्रियान् नियमयन् पथि सुप्रणीत । उच्चावचैर्गुरुमतैरुचितैर्वचोभिः शास्ति स्म वृत्तमखिलं पृथिवीश्वराणाम् ॥२०४॥ शार्दूलविक्रीडितम् इत्युच्चभरतशिनानुकथितं सर्वीयमुश्विराः क्षात्रं धर्ममनुप्रवद्य मुदिताः स्वां वृत्तिमन्वैयरः । योगक्षेमपथेपु तपु सहिताः सर्वे च वर्णाश्रमाः स्वे स्वे वर्त्मनि सुस्थिता पृतिमधुर्धर्मोत्सवैः प्रत्यहम् ।।२०५॥ प्रजाका पालन करने में प्रयत्न करना चाहिए ।।१६७।। इस प्रकार इन्द्रियोंको जीतनेवाले राजाका प्रजापालन नामका गुण कहा । अब समंजसत्व नामका अन्य गुण कहते हैं ।।१६८।। राजा अपने चित्तका समाधान कर जो दुष्ट पुरुषोंका निग्रह और शिष्ट पुरुषोंका पालन करता है वही उसका समंजसत्व गुण कहलाता है ॥१६६। जो राजा निग्रह करने योग्य शत्रु अथवा पुत्र दोनोंका निग्रह करता है, जिसे किसीका पक्षपात नहीं है, जो दुष्ट और मित्र, सभीको निरपराध बनानेकी इच्छा करता है और इस प्रकार मध्यस्थ रहकर जो सबपर समान दृष्टि रखता है वह समंजस कहलाता है तथा प्रजाओंको विषम दृष्टिसे नहीं देखना अर्थात् सबपर समान दृष्टि रखना ही राजाका समंजसत्व गुण है ॥२००-२०१॥ इस समंजसत्व गुणसे ही राजाको न्यायपूर्वक आजीविका करनेवाले शिष्ट पुरुपोंका पालन और अपराध करनेवाले दुष्ट पुरुषोंका निग्रह करना चाहिए ॥२०२।। जो पुरुष हिंसा आदि दोषोंमें तत्पर रहकर पाप करते हैं वे दुष्ट कहलाते हैं और जो क्षमा, संतोष आदि गुणोंके द्वारा धर्म धारण करने में तत्पर रहते हैं वे शिष्ट कहलाते हैं ।।२०३। इस प्रकार सोलहवें मनु तथा समस्त चक्रवतियोंमें प्रथम राजा महाराज भरतने उन क्षत्रियोंको भगवत्प्रणीत मार्गमें नियुक्त करते हुए, अपने पिता श्री वृषभदेवको इष्ट ऊंचे नीचे योग्य वचनोंसे राजाओंके समस्त आचारका उपदेश दिया ॥२०४॥ इस प्रकार भरतेश्वरने जिसका अच्छी तरह प्रतिपादन किया है ऐसे सबका हित करनेवाले, क्षत्रियोंके उत्कृष्ट धर्मको स्वीकार कर सब राजा लोग प्रसन्न हो अपने अपने आचरणोंका पालन करने लगे और उन र जाओंके योग ( नवीन वस्तुकी प्राप्ति ) तथा क्षेम ( प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा ) में प्रवृत्त रहनेपर अपना हित चाहनेवाले सब वर्णाश्रमोंके लोग अपने-अपने १ पक्षपातरहितः। २ अपराधरहितम् । ३ समञ्जसत्वसद्भाव: अ०, १०, स०, ल०, म० । ४ सुष्टु प्रोक्ते । ५ सर्वेभ्यो हितम् । ६ अनुजग्मुः । 'ऋ गतौ लुङि । ह्वादित्वात् शपः श्लुपि द्विर्भावे, झेर्जुसिति उत्तरऋकारस्य अकारादेशे, पूर्वऋकारस्य इत्वे, पुनर्यादेशेऽपि च कृते, 'एयरुः' इति सिद्धिः । ७ उर्वीश्वरेषु । ८ हितेन सहिताः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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