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________________ ३२९ एकचत्वारिंशत्तमं पर्व स निमित्तं निमित्तानां तन्ने मन्त्रे सशाकुने । दैवज्ञाने परं देवमित्यभूसंमतोऽधिकम् ॥१८॥ तत्संभूतौ : 'मुद्भूतमभूत् पुरुषलक्षणम् । उदाहरणमन्यत्र लक्षितं येन तत्तनोः ॥१४९॥ अन्येप्वपि कलाशास्त्रसंग्रहेषु कृतागमाः । तमेवादर्श मालोक्य संशयांशाद् व्यरंसिपुः ॥१५॥ येनास्य सहजा प्रज्ञा पूर्वजन्मानुषङ्गिणी । तेनैषा विश्वविद्यासु जाता परिणतिः परा ॥१५१॥ इत्थं सर्वेषु शास्त्रेषु कलासु सकलासु च । लोके स संमति प्राप्य तद्विद्यानां मतोऽभवत् ॥१५२॥ किमत्र बहुनोतन प्रज्ञापारमितो मनुः । कृत्स्य लोकवृत्तस्य स भेजे सूत्रधारताम् ॥१५३॥ राजगिद्वान्ततचतो धर्मशास्त्रार्थतत्त्ववित् । परिख्यातः कलाज्ञाने सोऽभून्मूर्ध्नि सुमेधाम् । १५४॥ इत्यादिराज" तत्सम्राडहो राजर्षिनायकम्। तत्सार्वभौममित्यस्य दिशासूच्छलितं यशः ॥१५॥ मालिनी इति सकलकलानामेकमोकः स चक्री कृतमतिभिरजर्य'. संगतं संविधित्सन् । बुधसदसि सदस्यान् बोधयन् विश्वविद्या व्यवृणुत" बुधचक्रीत्युच्छलत्कीर्तिकेतुः ॥१५६॥ की सृष्टि है इसलिए उक्त तीनों शास्त्र उन्हींके मत हैं ऐसा समझना चाहिए ॥१४७॥ वे निमित्त शास्त्रोंके निमित्त हैं, और तन्त्र, मन्त्र, शकुन तथा ज्योतिष शास्त्रमें उत्तम अधिष्ठाता देव हैं इस प्रकार सब लोगोंमें अधिक मान्यताको प्राप्त हुए थे ॥१४८॥ महाराज भरतके उत्पन्न होनेपर पुरुषके सब लक्षण उत्पन्न हुए थे इसलिए दूसरी जगह उनके शरीरके उदाहरण ही देखे जाते थे ॥१४९।। शास्त्रोंके जाननेवाले पुरुष ऊपर कहे हुए शास्त्रोंके सिवाय अन्य कलाशास्त्रोंके संग्रहमें भी भरतको ही दर्पणके समान देखकर संशयके अंशोंसे विरत होते थे अर्थात् अपने-अपने संशय दूर करते थे ॥१५०॥ चूंकि उनकी स्वाभाविक बुद्धि पूर्वजन्मसे सम्पर्क रखनेवाली थी इसलिए ही उनकी समस्त विद्याओं में उत्तम प्रगति हई थी ॥१५१।। इस प्रकार समस्त शास्त्र और समस्त कलाओं में प्रतिष्ठा पाकर वे भरत उन विद्याओंके जाननेवालोंमें मान्य हुए थे ॥१५२।। इस विषय में बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? इतना कहना ही पर्याप्त है कि बुद्धिके पारगामी कुलकर भरत समस्त लोकाचारके सूत्रधार हो रहे थे ॥१५३।। वे राजशास्त्रके तत्त्वोंको जानते थे, धर्मशास्त्रके जानकार थे, और कलाओंके ज्ञानमें प्रसिद्ध थे। इस प्रकार उत्तम विद्वानोंके मस्तकपर सुशोभित हो रहे थे अर्थात् सबमें श्रेष्ठ थे ॥१५४।। अहो, इनका प्रथम राज्य कैसा आश्चर्य करनेवाला है, यह सम्राट हैं, राजर्षियोंमें मुख्य हैं, इनका सार्वभौम पद भी आश्चर्यजनक है इस प्रकार उनका यश समस्त दिशाओंमें उछल रहा था ॥१५५।। इस प्रकार जो समस्त कलाओंका एकमात्र स्थान है, जो बुद्धिमान् पुरुषोंके साथ अविनाशी मित्रता करना चाहता है और यह विद्वानोंमें चक्रवर्ती है अथवा विद्वान् चक्रवर्ती है' इस प्रकार जिसकी कीर्तिरूपी पताका फहरा रही हैं ऐसा वह चक्रवर्ती भरत विद्वानोंकी सभामें समस्त विद्याओंका उपदेश देता हुआ समस्त विद्याओंका व्याख्यान करता था ।।१५६ १ कारणम् । २ निमित्तशास्त्राणाम् । ३ ज्योतिःशास्त्रे । ४ स मतोऽधिकम् इ० । स गतोऽधिकम् ल०, म । ५ संपूर्णशास्त्रम । ६ मुकुरम् । ७ विरमन्ति स्म । ८ कारणेन । ९ अनुसंबन्धिनी । १० नृपविद्यास्वरूपज्ञः । ११ आदिराजस्य प्रथा। १२ राजर्षिनायकस्य प्रथा। १३ सर्वभूमीशस्य प्रकाश । १४ मुख्यः । १५ गृहः । १६ अविनाशी । १७ सदसि योग्यान् । १८ विवरणमकरोत् । १९ विद्वज्जन । ४२
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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