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चत्वारिंशत्तमं पर्व
३०६ चौलकर्म - * चौलकर्मण्यथो मन्त्रः स्याञ्चोपनयनादिकम् । मुण्डभागी भवान्तं च पदमादावनुस्मृतम् ॥१४॥ ततो निर्ग्रन्थमुण्डादिभागी भवपदं परम् । ततो निष्क्रान्तिमुण्डादिभागी भव पदं परम् ॥१४८॥ स्यात्परमनिस्तारककेशभागी भवेत्यतः । परमेन्द्र पदादिश्च केशमागी मवध्वनिः।।१४६॥ परमार्हन्त्यराज्यादिकेशभागीति वारद्वयम् । भवेत्यन्तपदोपेतं मन्त्रोऽस्मिम्स्याच्छिखापदम् ॥१५०॥ शिखानेतेन मन्त्रेण स्थापयेद्विधिवद् द्विजः । ततो मन्त्रोऽयमानातो लिपिसंख्यानसंग्रहे ॥१५॥
चूर्णिः-उपनयनमुण्डभागी भव, निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव, परमनिस्तारककेशभागी भव, परमेन्द्रकेशभावी भव, परमराज्यकेशभागी भव, आर्हन्त्यराज्यकेशभागी भव । (इति चौलक्रियामन्त्रः) . शब्दपारभागी भव अर्थपारभागी भव । पदं शब्दार्थसंबन्धपाएमागी भवेत्यपि ॥१५॥
चूर्णिः-शब्दपारगामी ( भागी ) भव, अर्थपारगामी (भागी ) भव, शब्दार्थपारगामी ( भागी) भव, (लिपिसंख्यानमन्त्रः)
उपनीतिक्रियामन्त्रं स्मरन्तीम द्विजोत्तमाः । परमनिस्तारकादिलिङ्गभागी भवेत्यतः ॥१५३॥ की वर्षवृद्धि करनेवाला हो ) और 'आर्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव' (अरहन्त पदवीरूपी राज्यके बर्षका बढ़ानेवाला हो) ॥१४३-१४६॥
संग्रह - 'उपनयनजन्मवर्षवर्धनभागी भव, वैवाहनिष्ठवर्षवर्द्धनभागी भव, मुनीन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव. सरेन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव. मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव, यौवराज्यवर्षवर्द्धनभागी भव, महाराज्यवर्षवर्धनभागी भव, परमराज्यवर्षवर्धनभागी भव, आर्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव' ।
अब चौलकियाके मन्त्र कहते हैं - जिसके आदिमें उपनयन शब्द है और अन्तमें 'मण्डभागी भव' शब्द है ऐसा पहला मन्त्र जानना चाहिए अर्थात् 'उपनयनमुण्डभागी भव' ( उपनयन कियामें मुण्डन करनेवाला हो ) यह चौलकियाका पहला मन्त्र है ॥१४७॥ फिर 'निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव' (निर्ग्रन्थ दीक्षा लेते समय मुण्डन करनेवाला हो ) यह दूसरा मन्त्र है और उसके बाद 'निष्क्रान्तिमण्डभागी भव'- ( मुनि अवस्थामें केशलोंच करनेवाला हो) यह तीसरा मन्त्र है ॥१४८॥ तदनन्तर 'परमनिस्तारककेशभागी भव' ( संसारसे पार उतारनेवाले आचार्यके केशोंको प्राप्त हो) यह चौथा मन्त्र है और उसके पश्चात् 'परमेन्द्रकेशभागी भव' ( इन्द्र पदके केशोंको धारण करनेवाला हो ) यह पाँचवाँ मन्त्र बोलना चाहिए ॥१४९|| इसके बाद 'परमराज्यकेशभागी भव' (चक्रवर्तीके केशोंको प्राप्त हो) यह छठा मन्त्र है और 'आईन्त्यराज्यकेशभागी भव' ( अरहन्त अवस्थाके केशोंको धारण करनेवाला हो ) यह सातवाँ मन्त्र बोलना चाहिए। द्विजोंको इन मन्त्रोंसे विधिपूर्वक चोटी रखवाना चाहिए। अब आगे लिपिसंख्यानके मन्त्र कहते हैं ।।१५०-१५१॥
संग्रह-'उपनयनमुण्डभागी भव, निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव, निष्क्रान्तिमुण्डभागी भव, परमनिस्तारककेशभागी भव, परमेन्द्रकेशभागी भव, परमराज्यकेशभागी भव, आर्हन्त्यराज्यकेशभागी भव' ।
लिपिसंख्यानके मन्त्र-'शब्दपारभागी भव' (शब्दोंका पारगामी हो), 'अर्थपारगामी भागी भव' ( सम्पूर्ण अर्थका जाननेवाला हो) और 'शब्दार्थसंबन्धपारभागी भव' ( शब्द तथा अर्थ दोनोंके सम्बन्धका पारगामी हो ) ये पद लिपिसंख्यानके समय कहने चाहिए ॥१५२॥
संग्रह-'शब्दपारगामी भव, अर्थपारगामी भव, शब्दार्थपारगामी भव' ।। उत्तम द्विज नीचे लिखे हुए मन्त्रोंको उपनीति क्रियाके मन्त्ररूपसे स्मरण करते हैं -