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________________ ३०४ आदिपुराणम् भागीभवपदं वाच्यं मन्त्रयोगविशारदैः । स्यान्महाराज्यकल्याणभागी भव पदं परम् ॥१०६॥ भूयः परमराज्यादिकल्याणोपहितं' मतम् । मागी भवेत्यथार्हन्त्यकल्याणेन च योजितम् ॥१०॥ चूर्णिः-सज्जातिकल्याणभागी भव, सद्गृहिकल्याणभागी भव, वैवाहकल्याणभागी भव, मुनीन्द्र कल्याणभागी भव, सुरेन्द्र कल्याणभागी भव, मन्दराभिषेककल्याणभागी भव, यौवराज्यकल्याणभागी भव, महाराज्यकल्याणभागी भव, परमराज्यकल्याणमागी भत्र, आर्हन्त्यकल्याणभागी भव, (मोदक्रिया मन्त्रः) । प्रियोद्भवमन्त्रः-- प्रियोद्भवे च मन्त्रोऽयं सिद्धार्चनपुरःसरम् । दिव्यनेमिविजयाय पदात्परमनेमिवाक् ॥१०॥ विजयायेत्यथार्हन्त्यनेम्यादिविजयाय च । युक्तो मन्त्राक्षरैरेभिः स्वाहान्तः संमतो द्विजैः ॥१०९॥ चूर्णि:-दिव्यनेमिविजयाय स्वाहा, परमनेमिविजयाय स्वाहा, आर्हन्त्यनेमिविजयाय स्वाहा। (प्रियोद्भवमन्त्रः)। जन्मसंस्कारमन्त्रोऽयमेतेनार्मकमादितः । सिद्धाभिषेकगन्धाम्बुसंसिक्तं शिरसि स्थितम् ॥११०॥ कुलजातिवयोरूपगुणैः शीलप्रजान्वयैः । भाग्याविधवतासौम्यमूर्तित्वैः समधिष्टिता ॥१११॥ सम्यग्दृष्टिस्तवाम्बेयमतस्त्वमपि पुत्रकः । संप्रीतिमा नुहि त्रीणि प्राप्य चक्राण्यनुक्रमात् ॥१२॥ इत्यङ्गानि स्पृशेदस्य प्रायः सारूप्ययोगतः । तत्राधा यात्मसंकल्पं ततः सूक्तमिदं पठेत् ॥११३॥ मन्त्र बोलना चाहिए, फिर 'परमराज्यकल्याणभागी भव' ( परमराज्यके कल्याणको प्राप्त हो ) यह पद पढ़ना चाहिए और उसके बाद 'आर्हन्त्यकल्याणभागी भव' ( अरहन्त पदके कल्याणका उपभोग करनेवाला हो) यह मन्त्र बोलना चाहिए ॥१०३-१०७॥ संग्रह-'सज्जातिकल्याणभागी भव, सद्गृहिकल्याणभागी भव, वैवाहकल्याणभागी भव, मुनीन्द्रकल्याणभागी भव, सुरेन्द्रकल्याणभागी भव, मन्दराभिषेककल्याणभागी भव, यौवराज्यकल्याणभागी भव, महाराज्यकल्याणभागी भव, परमराज्यकल्याणभागी भव, आर्हन्त्यकल्याणभागी भव'। अब प्रियोद्धव मन्त्र कहते हैं - प्रियोद्भव क्रियामें सिद्ध भगवान की पूजा करनेके बाद नीचे लिखे मन्त्रोंका पाठ करना चाहिए - 'दिव्यनेमिविजयाय', 'परमनेमिविजयाय', और 'आर्हन्त्यनेमिविजयाय' इन मन्त्राक्षरोंके साथ द्विजोंको अन्तमें स्वाहा शब्दका प्रयोग करना अभीष्ट है अर्थात् 'दिव्यनेमिविजयाय स्वाहा' ( दिव्यनेमिके द्वारा कर्मरूप शत्रओंपर विजय प्राप्त करनेवालेके लिए हवि समर्पण करता हूँ), परमनेमिविजयाय स्वाहा' (परमनेमिके द्वारा विजय प्राप्त करनेवालेके लिए समर्पण करता हूँ) और 'आर्हन्त्यनेमिविजयाय स्वाहा' ( अरहन्त अवस्थारूप नेमिके द्वारा कर्म शत्रुओंको जीतनेवाले जिनेन्द्रदेवके लिए समर्पण करता हूँ ) ये तीन मन्त्र बोलना चाहिए ॥१०८-१०९॥ संग्रह-'दिव्यनेमिविजयाय स्वाहा, परमनेमिविजयाय स्वाहा, आर्हन्त्यनेमिविजयाय स्वाहा'। अब जन्म संस्कारके मन्त्र कहते हैं - प्रथम ही सिद्ध भगवानके अभिषेकके गन्धोदकसे सिंचन किये हुए बालकको यह मन्त्र पढ़कर शिरपर स्पर्श करना चाहिए और कहना चाहिए कि यह तेरी माता कुल, जाति, अवस्था, रूप आदि गुणोंसे सहित है, शीलवती है, सन्तानवती है, भाग्यवती है, अवैधव्यसे युक्त है, सौम्यशान्तमूर्तिसे सहित है और सम्यग्दृष्टि है इसलिए हे पुत्र, इस माताके सम्बन्धसे तू भो अनुक्रमसे दिव्य चक्र, विजयचक्र और परमचक्र तीनों चक्रोंको पाकर सत्प्रीतिको प्राप्त हो ॥११०-११२॥ इस प्रकार आशीर्वाद देकर पिता १ सहितम् । २ कुलजात्यादियथायोग्यगुणैरधिष्ठितः । ३ दिव्यचक्रविजयचक्रपरमचक्राणि । ४ समानरूपत्वसंबन्धात् । ५ बालके । ६ विधाय । ७ निजसंकल्पम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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