SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 265
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अष्टत्रिंशत्तम पर्व द्वादशाहात् परं नामकर्म जन्मदिनान्मतम् । अनुकूले सुतस्यास्य पित्रोरपि सुखावहे ॥८७।। यथाविभवमवेष्टं देवर्षिद्विजपूजनम् । शस्तं च नामधेयं तत् स्थाप्यमन्वयवृद्धिकृत् ।।८।। अष्टोत्तरसहस्राद् वा जिननामकदम्बकान् । घटपत्रविधानेन ग्राह्यमन्यतमं शुभम् ।।८।। इति नामकर्म। बहिर्यानं ततो 'द्वित्रैर्मासैस्त्रिचतुरैरुत । यथानुकूलमिष्टेऽह्नि कार्य तूर्यादिमङ्गलैः ॥१०॥ ततः प्रभृत्यभीष्टं हि शिशोः प्रसववेश्मनः । बहिःप्रणयनं मात्रा धाव्युत्सङ्गगतस्य वा ॥११॥ तत्र बन्धुजनादर्थलाभो यः पारितोषिकः । स तस्योत्तरकालेऽप्यो धनं पित्र्यं यदाप्स्यति ॥१२॥ इति बहिर्यानम् । ततः परं निषद्यास्य क्रिया बालस्य कल्प्यते । तद्योग्ये तल्प आस्तीणे कृतमङ्गलसन्निधौ ॥१३॥ सिद्धार्चनादिकः सर्वो विधिः पूर्ववदत्रं च । यतो दिव्यासनाहत्वमस्य स्यादुत्तरोत्तरम् ॥१४॥ इति निषद्या। जन्मदिनसे बारह दिनके बाद, जो दिन माता पिता और पुत्रके अनुकूल हो, सुख देनेवाला हो उस दिन नामकर्मकी क्रिया की जाती है ॥८७।। इस क्रिया में अपने वैभवके अनुसार अर्हन्तदेव और ऋषियोंकी पूजा करनी चाहिए, द्विजोंका भी यथायोग्य सत्कार करना चाहिए तथा जो वंशकी वृद्धि करनेवाला हो ऐसा कोई उत्तम नाम बालकका रखना चाहिए ॥८८॥ अथवा जिनेन्द्रदेवके एक हजार आठ नामोंके समूहसे घटपत्रकी विधिसे कोई एक शुभ नाम ग्रहण कर लेना चाहिए। भावार्थ - भगवान्के एक हजार आठ नामोंके एक हजार आठ कागजके टुकड़ोंपर अष्टगन्धसे सुवर्ण अथवा अनारकी कलमसे लिखकर उनकी गोली बना लेवे और पीले वस्त्र तथा मारियल आदिसे ढके हुए एक घड़ेमें भर देवे, कागजके एक टुकड़ेपर 'नाम' ऐसा शब्द लिखकर उसकी गोली बना लेवे इसी प्रकार एक हजार सात कोरे टुकड़ोंकी गोलियां बनाकर इन सबको एक दूसरे घड़ेमें भर देवे, अनन्तर किसी अबोध कन्या या बालकसे दोनों घड़ोंमें-से एक-एक गोली निकलवाता जावे। जिस नामकी गोलीके साथ नाम ऐसा लिखी हुई गोली निकले वही नाम बालकका रखना चाहिए। यह घटपत्र विधि कहलाती है ॥८९॥ यह सातवीं नामकर्म क्रिया है । तदनन्तर दो-तीन अथवा तीन-चार माहके बाद किसी शुभ दिन तुरही आदि मांगलिक बाजोंके साथ-साथ अपनी अनुकूलताके अनुसार बहिर्यान क्रिया करनी चाहिए ॥९०॥ जिस दिन यह क्रिया की जावे उसी दिनसे माता अथवा धायकी गोदमें बैठे हुए बालकका प्रसूतिगृहसे बाहर ले जाना शास्त्रसम्मत है ॥९१॥ उस क्रियाके करते समय बालकको भाई बान्धव आदिसे पारितोषिक - भेंटरूपसे जो कुछ धनकी प्राप्ति हो उसे इकट्ठा कर, जब वह पूत्र पिताके धनका अधिकारी हो तब उसके लिए सौंप देवे ।।९२॥ यह आठवीं बहिर्यान क्रिया है। ___ तदनन्तर, जिसके समीप मङ्गलद्रव्य रखे हुए हैं और जो बालकके योग्य हैं ऐसे बिछाये हए आसनपर उस बालककी निषद्या क्रिया की जाती है अर्थात् उसे उत्तम आसनपर बैठा लेते हैं ॥९३॥ इस क्रियामें सिद्ध भगवान्की पूजा करना आदि सब विधि पहलेके समान ही करनी चाहिए जिससे इस बालककी उत्तरोत्तर दिव्य आसनपर बैठनेकी योग्यता होती रहे ॥९४॥ यह नौंवी निषद्या क्रिया है। १ द्वौ वा त्रयो वा द्विवास्तैः । २ अथवा । ३ प्रसववेश्मनः सकाशात् । ४ परितोष भवः । ५ शय्यायाम् । ६ विस्तीर्णे । ७ निषद्याक्रियायाम् । ८ निषद्याक्रियायाः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy