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________________ २३६ आदिपुराणम् रत्नं स्थपतिरप्यस्य वास्तु विद्यापदातधीः । नाम्ना भद्रमुखोऽनेकप्रासादघटने पटुः ॥१७॥ शैलोदग्रो महानस्य यागहस्तीक्षरन्मदः । भद्रो गिरिचरः शुभ्रो नाम्ना विजयपर्वतः ॥ १७८॥ पवनस्य जयन् वेगं हयोऽस्य पवनंजयः । विजयार्द्धगुहोत्सङ्गं हेलया यो व्यलङ्घयत् ॥१७९।। प्रागुक्तवर्णनं चास्य स्त्रीरत्नं रूढनामकम् । स्वभावमधुरं हृद्यं रसायनमिवापरम् ॥१८॥ रत्नान्येतानि दिव्यानि बभूवुश्चक्रवर्तिनः । देवताकृतरक्षाणि यान्यलथानि विद्विषाम् ॥१८१॥ आनन्दिन्योऽब्धिनि?षा भोऽस्य द्वादशाभवन् । द्विषड्योजनमापूर्य स्वैर्वानर्याः प्रदध्वनुः ॥१८२॥ आसन् विजयघोषाख्याः पटहा द्वादशापरे । गृहकेकिभिरुद्रीवैः सानन्दं श्रुतनिःस्वनाः ॥१८३।। गम्भीरावर्तनामानः शङ्खा गम्भीरनिःस्वनाः । चतुर्विंशतिरस्यासन् शुभाः पुण्याब्धिसंभवाः ।।१८४॥ कटका रत्ननिर्माणा विभी/राङ्गदाह्वयाः । रेजुः प्रकोष्टमावेष्टय तडिद्वलयविभ्रमाः ॥१८॥ पताकाकोटयोऽस्याष्टचत्वारिंशत्प्रमा मताः । मरुत्प्रेङ्खोलि तोत्प्रेङ्खदंशुकोन्मृष्टखाङ्गणाः ॥१८६॥ महाकल्याणकं नाम दिव्याशनमभूद् विभोः । कल्याणाङ्गस्य येनास्य तृप्तिपुष्टीबलान्विते ॥१८॥ भक्षावामृतगर्भाख्या रुच्यास्वादाः सुगन्धयः । नान्ये जरयितुं शक्ता यान् गरिष्ठरसोत्कटान् ॥१८८॥ स्वायं चामृतकल्पाख्यं हृद्यास्वादं सुसंस्कृतम् । रसायनरसं दिव्यं पानकं चामृताह्वयम् ॥१८६।। चिन्तामें नियुक्त था ।।१७६॥ मकान बनानेकी विद्यामें जिसकी बुद्धि प्रवेश पाये हुई है और जो अनेक राजभवनोंके बनानेमें चतुर है ऐसा भद्रमुख नामका उनका शिलावटरत्न ( इंजीनियर ) था ।।१७७।। जो पर्वतके समान ऊँचा था, बहुत बड़ा था, पूज्य था, जिससे मद झर रहा था, भद्र जातिका था और जिसका गर्जन उत्तम था ऐसा विजयपर्वत नामका सफेद हाथी था ॥१७८॥ जिसने विजयार्धपर्वतकी गुफाके मध्यभागको लीलामात्रमें उल्लंघन कर दिया था ऐसा वायके वेगको जीतनेवाला पवनंजय नामका घोडा था ॥१७९॥ और जिसका वर्णन पहले कर चके हैं. जिसका नाम अत्यन्त प्रसिद्ध है. जो स्वभावसे ही मधर है और जो किसी अन्य रसायनके समान हृदयको आनन्द देनेवाला है ऐसा सुभद्रा नामका स्त्रीरत्न था ॥१८०॥ इस प्रकार चक्रवर्तीके ये दिव्य रत्न थे जिनकी देव लोग रक्षा किया करते थे, और जिन्हें शत्रु कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे ॥१८१॥ उस चक्रवर्तीके समुद्रके समान गम्भीर आवाजवाली आनन्दिनी नामकी बारह भेरियाँ थीं जो अपनी आवाजको बारह योजन दर तक फैलाकर बजती थीं ॥१८२।। इनके सिवाय बारह नगाड़े और थे जिनकी आवाज घरके मयूर ऊँची गरदन कर बड़े आनन्दके साथ सुना करते थे ॥१८३॥ जिनकी अवाज अतिशय गम्भोर है. जो शभ हैं. और पुण्यरूपी समद्रसे उत्पन्न हए हैं ऐसे गम्भीरावर्त नामके चौबीस शंख थे ॥१८४॥ उस प्रभके रत्नोंके बने हए वीरांगद नामके कड़े थे जो कि हाथकी कलाईको घेरकर सुशोभित हो रहे थे और जिनको कान्ति बिजलीके कड़ोंके समान थी ॥१८५।। वायुके ऑकोरेसे उड़ते हुए कपड़ोंसे जिन्होंने आकाशरूपी आँगनको झाड़कर साफ कर दिया है ऐसी उसकी अड़तालीस करोड़ पताकाएँ थीं ।।१८६।। महाराज भरतके महाकल्याण नामका दिव्य भोजन था जिससे कि कल्याणमय शरीरको धारण करनेवाले उनके बलसहित तृप्ति और पुष्टि दोनों ही होती थीं ॥१८७।। जो अत्यन्त गरिष्ठ रससे उत्कट हैं, जिन्हें कोई अन्य पचा नहीं सकता तथा जो रुचिकर, स्वादिष्ट और सुगन्धित है ऐसे उसके अमृतगर्भ नामके भक्ष्य अर्थात् खाने योग्य मोदक आदि पदार्थ थे ॥१८८।। जिनका स्वाद हृदयको अच्छा १ वास्तुविद्यास्थाने स्वीकृतबुद्धिः । २ पूज्य । ३ गिरिवरः ल०, प० । ४ चलनेनोच्चलत् । ५ आहारेण । ६ पुरुषाः। ७ जीर्णीकर्तुम् । ८ अतिगुरु । ९ क्रमुकदाडिमादि। "ओदनाद्यशनं, स्वाद्यं ताम्बूलादि, जलादिकम् । पेयं, स्वाद्यमपूपाद्यं, त्याज्यान्येतानि शक्तिकैः ।"
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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