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________________ २२० आदिपुराणम् जयति भरतराजप्रांशुमल्यग्ररत्नो पललुलितनखेन्दुः स्रष्टुराद्यस्य सूनुः । भुजगकुलकलापैराकुलैर्नाकुलत्वं धृतिबलकलितो यो योगभृन्नैव भेजे ॥२०१॥ 'शितिभिरलिकुलाभैराभुजं लम्बमानः *पिहितभुजविटङ्को मूर्धजिल्लि ताः । जलधरपरिरोधध्याममूर्द्धव भूध्रः श्रियमपुषदनूनां दोर्बली यः स नोऽव्यात् ॥२१०॥ स जयति हिमकाले यो हिमानीपरीतं' वपुरचल इवोच्चैर्बिभ्रदाविर्वभूव । नवघनसलिलोधैर्यश्च धौतोऽन्दकाले खरघृणि किरणानप्युष्णकाले विषेहे ॥२११॥ जगति जयिनमेनं योगिनं योगिवर्यै रधिगतमहिमानं मानितं माननीयैः । स्मरति हृदि नितान्तं यः स शान्तान्तरात्मा भजति विजयलक्ष्मीमाशु जैनीमजय्याम् ॥२१२॥ इत्या भगवन्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे भुजबलिजलमल्लदृष्टियुद्धविजयदीक्षाकेवलोत्पत्तिवर्णनं नाम षट्त्रिंशत्तमं पर्व ॥३६॥ सदा जयवन्त हों ॥२०८॥ भरतराजके ऊँचे मुकुटके अग्र भागमें लगे हुए रत्नोंसे जिनके चरणके नखरूपी चन्द्रमा अत्यन्त चमक रहे थे, जो धैर्य और बलसे सहित थे तथा जो इसलिए ही क्षोभको प्राप्त हुए सोंके समूहसे कभी आकुलताको प्राप्त नहीं हुए थे वे आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेवके पुत्र बाहुबली योगिराज सदा जयवन्त रहें ॥२०९॥ भ्रमरोंके समूहके समान काले, भुजाओं तक लटकते हुए तथा जिनका अग्रभाग टेढ़ा हो रहा है ऐसे मस्तकके बालोंसे जिनकी भुजाओंका अग्रभाग ढक गया है और इसलिए ही जो मेघोंके आवरणसे मलिन शिखरवाले पर्वतकी पूर्ण शोभाको पुष्ट कर रहे हैं वे भगवान् बाहुबली हम सबकी रक्षा करें ॥२१०॥ जो शीतकालमें बर्फसे ढके हुए ऊँचे शरीरको धारण करते हुए पर्वतके समान प्रकट होते थे, वर्षाऋतुमें नवीन मेघोंके जलके समूहसे प्रक्षालित होते थे - भीगते रहते थे और ग्रीष्मकालमें सूर्यको किरणोंको सहन करते थे वे बाहुबली स्वामी सदा जयवन्त हों ॥२११॥ जिन्होंने अन्तरंग-बहिरंग शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली है, बड़े-बड़े योगिराज ही जिनकी महिमा जान सकते हैं, और जो पूज्य पुरुषोंके द्वारा भी पूजनीय हैं ऐसे इन योगिराज बाहुबलीको जो पुरुष अपने हृदयमें स्मरण करता है उसका अन्तरात्मा शान्त हो जाता है और वह शीघ्र ही जिनेन्द्रभगवान्की अजय्य ( जिसे कोई जीत न सके ) विजयलक्ष्मी - मोक्षलक्ष्मीको प्राप्त होता है ॥२१२।। इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें बाहुबलीका जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन करनेवाला छत्तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ। १ कृष्णः । २ आच्छादितबाहवलभीः । ३ वक्र । 'अविरुद्धं कुटिलं भुग्नं वेल्लितं वक्रमित्यपि' इत्यभिधानात् । ४ हिमसंहतिवेष्टितम् । 'हिमानी हिमसंहतिः' इत्यभिधानात् । ५ प्रावृट्काले । ६ सूर्यः । ७ सहति स्म । ८ जयशीलम् । ९ पूजितम् । १० उपशान्तचित्तः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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