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________________ २१२ आदिपुराणम् परीषहजयादस्य विपुला निर्जराऽभवत् । कर्मणां निर्जरोपायः परीषहजयः परः ॥१२८॥ क्रोधं तितिक्षया'मानमुत्सेक परिवर्जनैः । मायामृजुतया लोमं संतोषेण जिगाय सः ॥१२६॥ पञ्चेन्द्रियाण्यनायासात् सोऽजयजितमन्मथः । विषयेन्धनदीप्तस्य कामाग्नेः शमनं तपः ॥१३०॥ आहारमयसंज्ञे च समैथुनपरिग्रहे । अनङ्गविजयादेताः संज्ञाः क्षपयति स्म सः॥१३१॥ इत्यन्तरङ्गशत्रूणां स भअन् प्रसरं मुहुः । जयति स्माऽऽत्मनाऽऽत्मानमात्मविद् विदिताखिलः ॥१३२॥ व्रतं च समितीः सर्वाः सम्यगिन्द्रियरोधनम् । अचेलतां च केशानां प्रतिलुञ्चनसंग रम् ॥१३॥ आवश्यकेष्वसंबाधमस्नानं झितिशायिताम् । अदन्तधावनं स्थित्वा भुक्ति भक्तं च नासकृत् ॥१३॥ प्राहुर्मूलगुणानेतान् तथोत्तरगुणाः परे। तेषां माराधने यत्रं सोऽतनिष्टातनुर्मुनिः ॥१३५॥ "एतेष्वहापयन्" कांचिद् व्रतशुद्धिं परां श्रितः । सोऽदीपि किरण स्वानिव दीप्तैस्तपोंऽशुमिः ॥१३६॥ गौरवैस्विभिरुन्मुक्तः परां निःशल्यतां गतः ।' धर्मेर्दशमिरारुढदायोऽभून्मुक्तिवर्त्मनि ॥१३७॥ ___ गुप्तित्रयमयीं गुप्तिं श्रितो ज्ञानासिमासुरः । संवर्मितः समितिमिः स भेजे विजिगीषुताम् ॥१३८॥ इस प्रकार परिषहोंके जीतनेसे उनके बहुत बड़ी कर्मोकी निर्जरा हो गयी थी सो ठीक ही है क्योंकि परिषहोंको जीतना ही कर्मोकी निर्जरा करनेका श्रेष्ठ उपाय है ॥१२८। उन्होंने क्षमासे क्रोधको, अहंकारके त्यागसे मानको, सरलतासे मायाको और सन्तोषसे लोभको जीता था ॥१२९।। कामदेवको जीतनेवाले उन मुनिराजने पाँच इन्द्रियोंको अनायास ही जीत लिया था सो ठीक ही है क्योंकि विषयरूपी ईधनसे जलती हुई कामरूपी अग्निको शमन करनेवाला तपश्चरण ही है। भावार्थ-इन्द्रियोंको वश करना तप है और यह तभी हो सकता है जब कामरूपी अग्निको जीत लिया जावे ॥१३०॥ उन्होंने कामको जीत लेनेसे आहार, भय, मैथुन और परिग्रह इन संज्ञाओंको नष्ट किया था ॥१३१॥ इस प्रकार अन्तरंग शत्रुओंके प्रसारको बारबार नष्ट करते हुए उन आत्मज्ञानी तथा समस्त पदार्थोंको जाननेवाले मुनिराजने अपने आत्माके द्वारा ही अपने आत्माको जीत लिया था ॥१३२॥ पाँच महाव्रत, पाँच समितियाँ, पाँच इन्द्रियदमन, वस्त्र परित्याग, केशोंका लोंच करना, छह आवश्यकोंमें कभी बाधा नहीं होना, स्नान नहीं करना, पृथिवीपर सोना, दाँतौन नहीं करना, खड़े होकर भोजन करना और दिनमें एक बार आहार लेना, इन्हें अट्ठाईस मूलगुण कहते हैं। इनके सिवाय चौरासी लाख उत्तर गुण भी हैं, वे महामुनि उन सबके पालन करनेमें प्रयत्न करते थे ॥१३३-१३५॥ इनमें कुछ भी नहीं छोड़ते हुए अर्थात् सबका पूर्ण रीतिसे पालन करते हुए वे मुनिराज व्रतोंकी उत्कृष्ट विशुद्धिको प्राप्त हुए थे तथा जिस प्रकार देदीप्यमान किरणोंसे सूर्य प्रकाशमान होता है उसी प्रकार वे भी तपकी देदीप्यमान किरणोंसे प्रकाशमान हो रहे थे ॥१३६।। वे रसगौरव, शब्द गौरव, और ऋद्धिगौरव इन तीनोंसे सहित थे, अत्यन्त नि.शल्य थे और दशधर्मोके द्वारा उन्हें मोक्षमार्ग में अत्यन्त दृढ़ता प्राप्त हो गयी थी ॥१३७।। वे मुनिराज किसी विजिगीषु अर्थात् शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करनेवाले राजाके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार विजिगीषु राजा किसी दुर्ग आदि सुरक्षित स्थानका आश्रय लेता है, तलवारसे देदीप्यमान होता है और कवच पहने रहता है उसी प्रकार उन मुनिराजने भी तीन गुप्तियोंरूपी दुर्गोका आश्रय ले रखा था, वे भी ज्ञानरूपी तलवारसे देदीप्यमान हो रहे थे और पाँच समितियाँरूप कवच पहन रखा था। भावार्थ - यथार्थमें वे कर्मरूप शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा रखते थे १ क्षमया । २ गर्ग। ३ त०, ब०, अ०, स०, इ०, ५०, द० पुस्तकसंमतोऽयं क्रमः । ल० पुस्तके १२९-१३० श्लोकयोय॑तिक्रमोऽस्ति । ४ समूहम् । ५ ज्ञातसकलपदार्थः । ६ प्रतिज्ञाम् । ७ एकभुक्तमित्यर्थः । ८ मूलोत्तरगुणानाम् ।९ महान् । १० प्रोक्तगुणेषु । ११ हानिमकुर्वन् । १२ उत्तमक्षमादिभिः । १३ रक्षाम् । १४ कवचितः।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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