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________________ पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व 3 या विषयामुपायानां नियोजनम् सिद्ध पर्यासः फलिष्यति पराभयम् ||१९|| नैकान्तशमनं साम समाम्नातं सहोमणि । स्निग्धेऽपि हि जने तप्ते सर्पिषीवाम्बु सेचनम् ॥१००॥ उपप्रदानमध्येवं प्रायं मन्ये महौजसि । समित्सहस्वदानेऽपि दीसस्याशेः कुतः शमः ॥१०१॥ लोहस्यैवोपतप्तस्य' मृदुता न मनस्विनः । दण्डोऽप्यनुनयग्राह्ये सामजे न मृगद्विषि ॥ १०२ ॥ ततो व्यत्यासयनेनानुपायाननुपायवित्। स्वयं प्रयोगगुण्यात् सीदत्येव न मारशः ॥ १०३ ॥ १० の 1 १८१ में पहले कुछ देनेके विधानके साथ सामका प्रयोग किया जावे और बादमें भेद तथा दण्ड उपाय काममें लाये जायें तो उनके द्वारा पहले प्रयोग में लाया हुआ साम उपाय बाधित हो जाता है । भावार्थ - यदि न्यायवान् विरोधीके लिए पहले कुछ देनेका प्रलोभन देकर साम अर्थात् शान्तिका प्रयोग किया जावे और बाद में उसीके लिए भेद तथा दण्डकी धमकी दी जावे तो ऐसा करनेसे उसका पहले प्रयोग किया हुआ साम उपाय व्यर्थ हो जाता है क्योंकि न्यायवान् विरोधी उसकी कूटनीतिको सहज ही समझ जाता है || १८ || साम, दाम, दण्ड, भेद इन चारों उपायोंका यथायोग्य स्थान में नियोग करना कार्यसिद्धिका कारण है और विपरीत नियोग करना पराभवका कारण है । भावार्थ जो जिसके योग्य है उसके साथ वही उपाय काम में लानेसे सफलता प्राप्त होती है और विरुद्ध उपाय काम में लानेसे तिरस्कार प्राप्त होता है || ९९|| प्रतापशाली पुरुषके साथ साम अर्थात् शान्तिका प्रयोग करना एकान्तरूपसे शान्ति करनेवाला नहीं माना जा सकता क्योंकि प्रतापशाली मनुष्य स्निग्ध अर्थात् स्नेही होनेपर भी यदि क्रोधसे उत्तप्त हो जावे तो उसके साथ शान्तिका प्रयोग करना स्निग्ध अर्थात् चिकने किन्तु गरम घी में पानी सींचनेके समान है । भावार्थ - जिस प्रकार गरम घीमें पानी डालने से वह शान्त नहीं होता बल्कि और भी अधिक चटपटाने लगता है उसी प्रकार क्रोधी मनुष्य शान्तिके व्यवहारसे शान्त नहीं होता बल्कि और भी अधिक बड़बड़ाने लगता है ॥ १०० ॥ इसी प्रकार अतिशय प्रतापशाली पुरुषको कुछ देनेका विधान करना भी मैं निःसार समझता हूँ क्योंकि हजारों समिधाएँ ( लकड़ियाँ ) देनेपर भी प्रज्वलित अग्नि कैसे शान्त हो सकती है। तेजस्वी मनुष्य कष्ट देनेसे ॥ १०१ ॥ जिस प्रकार लोहा तपानेसे नरम नहीं होता उसी प्रकार नरम नहीं होता इसलिए उसके साथ दण्डका प्रयोग करना निरर्थक है क्योंकि अनुनय विनय कर पकड़ने योग्य हाथीपर ही दण्ड चल सकता है सिंहपर नहीं में नरम हो जाता है इसलिए यहाँ लोहाका उदाहरण व्यतिरेकरूपसे जा सकता है कि जिस प्रकार तपा हुआ लोहा नरम हो जाता है उस प्रकार तेजस्वी मनुष्य कष्टमें पड़कर नरम नहीं होता इसलिए उसपर दण्डका प्रयोग करना व्यर्थ है। अरे, दण्ड भी प्रेम पुचकार कर पकड़ने योग्य हाथीपर ही चल सकता है न कि सिंहपर भी || १०२ | इसलिए इन साम दान आदि उपायोंका विपरीत प्रयोग करनेवाले और इसलिए ही उपाय न जाननेवाले आप जैसे लोग इन चारों उपायोंके प्रयोगका ज्ञान न होनेसे स्वयं दुःखी होते हैं ॥ १०३ ॥ विशेष लोहा गरम अवस्थामानकर ऐसा भी अर्थ किया १ सामभेदादि योग्यपुरुपमनतिक्रम्य । २ वचननियोजनम् । ३ सप्रतापे । ४ एतत्सदृशम् । ५. इन्धनसमूह ६ उपतप्तस्य लोह्स्य यथा मृदुतास्ति तथा उपतप्तस्य मनस्विनो मृदुता नास्तीत्यर्थः । ७ सिंहे । ८ वैपरीत्येन योजन ९ तानु ल० द० अ०, प०, स० समाधीन १० भवादृशः ८० ल० अ०, प०, स०, ६० 1 - ,
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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