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________________ आदिपुराणम 3 समुत्पत्य क्वचिदष्यस्वलद्गतिः । संप्राप्यद्विमवत्कटं तद्वेश्माकम्पयन् पतन् ॥८९॥ साध्यायं ज्ञातचक्रधरागमः । उच्चचाल चलन्मौलिस्तन्निवासी सुरोत्तमः ॥ ९० ॥ संप्राप्तमुदेश यमध्यास्ते स्म चक्रतुत दरोप संरम्भो धनुयमसकृत्स्पृशन् ॥९१॥ " ११ 15 हिमवान पृथग्जनः । चितोऽय वया देवदत्तमतिमानुषम् ॥९२॥ 'विप्रान्तराः स्वास्मदावासाः कव भवच्छरः । तथाप्याकम्पितास्तेन पततैपरे वयम् ॥ ९३॥ स्वप्रतापः शरण्याजातुपतन् गगनाङ्गणम् गणवदपदं कर्तुमस्मान्नाहूतवान् भुवम् ॥९४॥ विजितान्धिः समाक्रान्तविज या गुहीदर हिमाडिशिप जम्भते ते जयोग्रमः ॥९५॥ जयवानुवाद सिदग्विजयस्ते जयतान् नन्दाविद्विषीष्ट भवानिति ॥९६॥ समुचरत् जयध्यानमुखः स सुंरः समम् । प्रभु समाजयामास संपणारं सुरोत्तमः ॥१७॥ अभिषिच्य च राजेन्द्र राजयद्विधिना ददी गोशीचन्दनं सोऽस्मै सममोपथिमालया ॥९८॥ मुक्तिवासिनी देव दृरानमितमीलयः । देवाखामानमन्ये प्रसादाभिकाङ्क्षिणः ॥ ९९ ॥ जिसकी गति कहीं भी स्खलित नहीं होती ऐसा वह बाण ऊपरकी ओर दूर तक जाकर वहाँपर रहनेवाले देवके भवन में पड़कर उस भवनको हिलाता हुआ हिमवत्कूटपर जा पहुँचा ||२९॥ मागध देवके समान कुछ विचार कर जिसने चक्रवर्तीका आगमन समझ लिया है ऐसा यहाँका रहनेवाला देव अपना मस्तक झुकाता हुआ चला ॥ ९० ॥ और जिसने अपना कुछ क्रोध रोक लिया है ऐसा वह देव धनुषकी चापका स्पर्श करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा जहाँपर कि चक्रवर्ती विराजमान थे || ११|| वह देव भरतसे कहने लगा कि हे देव, यह हिमवान् पर्वत अत्यन्त ऊँचा है और साधारण पुरुषोंके द्वारा उल्लंघन करने योग्य नहीं है फिर भी आज आपने उसका उल्लंघन कर दिया है इसलिए आपका चरित्र मनुष्योंका उल्लंघन करनेवाला अर्थात् लोकोत्तर है ।। ९२ ।। हे देव, बहुत दूर बने हुए हम लोगोंके आवास कहाँ ? और आपका बाण कहाँ ? तथापि पड़ते हुए इस बाणने हम सबको एक ही साथ कम्पित कर दिया ॥ ९३ ॥ हे देव, यह आपका प्रताप बाणके व्याजसे आकाशमें उछलता हुआ ऐसा जान पड़ता था मानो हम लोगोंको गणबद्ध ( चक्रवर्ती के अधीन रहनेवाली एक प्रकारकी देवोंकी सेना ) देवोंके स्थानपर नियुक्त होनेके लिए बुला ही रहा था || १४ || जिसने समुद्रको भी जीत लिया है और विजयार्ध पर्वतकी गुफाओंके भीतर भी आक्रमण कर लिया है ऐसा यह आपका विजय करनेका उद्यम आज हिमवान् पर्वतके शिखरोंपर भी फैल रहा है || १५ || हे प्रभों, आपका समस्त दिग्विजय सिद्ध हो चुका है इसलिए हे जयशील, आपकी जय हो, आप समृद्धिमान हों और सदा बढ़ते रहें इस प्रकार आपका जयजयकार बोलना पुनरुक्त है || ९६ ।। इस प्रकार उच्चारण करता हुआ जो जय जय शब्दोंसे वाचाल हो रहा है ऐसा वह उत्तम देव अन्य अनेक उत्तम देवोंके साथ-साथ सब तरहके उपचारोंसे भरतकी सेवा करने लगा ||९७ ॥ तथा राजाओंके योग्य विधिसे राजाधिराज भरतका अभिषेक कर उसने उनके लिए औषधियों के समूह के साथ गोशीर्ष नामका चन्दन समर्पित किया || ९८ || और कहा कि हे देव, आपके क्षेत्रमें रहनेवाले ये देव आपकी प्रसन्नताकी इच्छा करते हुए दूरसे ही मस्तक झुकाकर आपके लिए नमस्कार 菜々 1५ १ संप्रापद्धिम- प०, ल० । २ विषायत्यर्थः । ३ हिमवत्कृटवासी हेमवानाम ४ ईपपीडित | ११ जयोद्योगः । ५ सामान्यैः । ६ दिव्यमित्यर्थः । ७दूर । ८ भवतो वाणः । ९ शरेण । १० युगपत् । १२ सार्थक पुनर्वचनमनुवादः । १३ संभावयामास । १४ राजाविधानेन । १५ १६] वनपुष्पमाला १७ तवं पालन क्षेत्रवासिनः । हरिचन्दनम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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