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________________ १०४ आदिपुराणम् प्रचेलुः सर्वसामग्रथा नृपाः संभृतकोष्टिकाः । प्रभोश्चिरं जयोद्योगमाकलय्याहिमाचलम् ॥८२॥ भटैर्लाकुटिकैः केचिद्धता लालाटिकैः परे । नृपाः पश्चास्कृतानीका विमोनिकटमाययुः ॥८३॥ समन्तादिति सामन्तैरापतद्भिः संसाधनैः । समिद्धशासनश्चक्री समेत्य जयकारितः ॥८४॥ सामवायिक सामन्तसमाजैरिति सर्वतः । सरिदोधैरिवाम्भोधिरापूर्यत विभोर्बलम् ॥८५॥ सवनः सावनिः सोऽद्रिः परितो रुरुधे बलैः । जिनजन्मोत्सवे मेरुरनीकैरिव नाकिनाम् ॥८६॥ विजया चलप्रस्था विभोरध्यासिता बलैः । स्वर्गावासश्रियं तेनुविभक्तपमन्दिरैः'' ॥८॥ प्रश्वेलित रथं विष्वक् प्रहेषिततुरंगमम् । प्रबृहितगजं सैन्यं ध्वनिसादकरोद् गिरिम् ॥८८॥ बलध्वानं गुहारन्धैः प्रतिश्रुद्धत मुद्वहन् । सोऽद्विरुद्रिततद्रोधो" ध्रुवं फूत्कारमातनोत् ॥८९॥ अत्रान्तरे ज्वलन्मौलिप्रभापिञ्जरिताम्बरः । ददृशे प्रभुणा ब्योम्नि गिरेरवतरत् सुरः ॥१०॥ स ततोऽवतरन्नद्रेर्बभौ "सानुचरोऽमरः । सवनः” कल्पशाखीव लसदाभरणांशुकः ॥११॥ भरतेश्वरका हिमवान् पर्वत तक विजय प्राप्त करनेका उद्योग बहुत समयमें पूर्ण होगा ऐसा समझकर राजा लोग सब प्रकारकी सामग्रीसे कोठे भर-भरकर निकले ॥८२।। कितने ही राजा लाठी धारण करनेवाले योद्धाओंके साथ, और कितने ही ललाटकी. ओर देखनेवाले उत्तम सेवकोंके साथ, अपनी सेना पीछे छोड़कर भरतके निकट आये ।।८३॥ इस प्रकार अपनीअपनी सेना सहित चारों ओरसे आते हुए अनेक सामन्तोंने एक जगह इकट्ठे होकर, जिनकी आज्ञा सब जगह देदीप्यमान है ऐसे चक्रवर्तीका जय-जयकर किया ॥८४॥ जिस प्रकार नदियोंके समूहसे समुद्र भर जाता है उसी प्रकार सहायता देनेवाले सामन्तोंके समूहसे भरतकी सेना सभी ओरसे भर गयी थी ॥८५।। जिस प्रकार भगवान्के जन्म-कल्याणके समय वन और भूमि सहित सुमेरु पर्वत देवोंकी सेनाओंसे भर जाता है उसी प्रकार वह विजयार्ध पर्वत भी वन और भूमिसहित चारों ओरसे सेनाओंसे भर गया था ॥८६।। भरतकी सेनाओंसे अघिष्ठित हुए विजयाध पर्वतके शिखर अलग-अलग तने हुए राजमण्डपोंसे स्वर्गकी शोभा धारण कर रहे थे ॥८७॥ जिसमें चारों ओरसे रथ चल रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं और हाथी गरज रहे हैं ऐसी उस सेनाने उस विजयार्ध पर्वतको एक शब्दोंके ही अधीन कर दिया था अर्थात् शब्दमय बना दिया था ॥८८॥ गुफाओंके छिद्रोंसे जिसकी प्रतिध्वनि निकल रही है ऐसे सेनाके शब्दोंको धारण करता हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो सेनासे घिर जानेके कारण फू फू शब्द ही कर रहा हो अर्थात् रो ही रहा हो । ८९।। ... इसी बीचमें भरतने, देदीप्यमान मुकुटकी कान्तिसे जिसने आकाशको भी पीला कर दिया है और जो पर्वतपर-से नीचे उतर रहा है ऐसा एक देव आकाशमें देखा ॥९०॥ जिसके आभूषण तथा वस्त्र देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा वह देव अपने सेवकोंसहित उस पर्वतसे उतरता हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो जिसके आभूषण और वस्त्र देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा वनसहित १ भूपाः ल । २ तण्डुलादिभारवाहकबलीबर्दाः । ३ लकुटम् आयुधं येषां तैः । ४ प्रभो वदशिभिः 'लालाटिकः प्रभोर्भावदर्शी कार्यक्षमश्च यः' इत्यभिधानात् । ५ जयकारं नीतः संजातजयकारो वा जय जयेति स्तुत इति यावत् । ६ मिलित । ७ वनसहितः । ८ अवनिसहितः । ९ सैन्यैः । १० सानवः । ११ मण्डलै: ल। १२ सिंहनादित 'क्ष्वेडा तु सिंहनादः स्यात्' इत्यभिधानात् । १३ शब्दमयमकरोत् । १४ प्रतिध्वनिभूतम् 'सती प्रतिश्रुत्प्रतिध्वाने' इत्यभिधानात् । १५ उत्कटसेनानिरोधः । १६ अनुचरैः सहितः । १७ वनेन सहितः
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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