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________________ विषपानकमाणिका करना विषय पृष्ठ | विषय · आदित्यगति मुनिराज ने अवधिज्ञान से जान देव का स्मरण कर दुःखी होना और पण्डिता कर कहा कि तुम्हारा 'स्वामी भव्य है, धाय को उसकी परिचर्या के लिए नियुक्त वह अगले दसवें भव में भरत-क्षेत्र का १२७-१२८ प्रथम तीर्थंकर होगा १११ राजा वज्रदन्त को चक्ररत्न के प्रकट होने तथा महाबल के पूर्वभव का वर्णन १११-११२ पिता को केवलज्ञान प्राप्त होने के समाचार महाबल के द्वारा देखे गये दो स्वप्नों का फल मिले । प्रथम ही कैवल्य महोत्सव में जाना पहले ही मन्त्री को मुनिराज के द्वारा और वहीं अवधिज्ञान का उत्पन्न होना १२८-१२६ बताया जाना ११२-११३ | बाद में चक्ररत्न की पूजा करके दिग्विजय को स्वयंबुद्ध का शीघ्र ही महाबल को स्वप्नों का प्रस्थान करना फल बतलाते हुए कहना कि आपकी आयु पण्डिता धाय का श्रीमती से पूर्वभव के सिर्फ एक माह की अवशिष्ट रह गयी है। ११३ ललितांग देव सम्बन्धी समाचार का जानना महाबल के द्वारा अपनी आयु का क्षय और श्रीमती के द्वारा बनाये गये पूर्वभव के निकटस्थ जानकर आठ दिन तक आष्टाह्निक चित्रपट को लेकर ललितांग का पता लगाने के उत्सव का किया जाना और उसके बाद पुत्र लिए महापूत जिनालय की ओर जाना १२९-१३४ को राज्य देकर विजया के सिद्धकूट पर जिनालय की शोभा का वर्णन १३४-१३५ बाईस दिन की सल्लेखना धारण करना ११३-११६ पण्डिता धाय का मन्दिर में चित्रपट पसारकर सल्लेखना के प्रभाव से वह ऐशान स्वर्ग में बैठना ललितांग नाम का महर्दिक देव हुआ । चक्रवर्ती का दिग्विजय कर वापस लौटना उसके ऐश्वर्य आदि का वर्णन । ११६-११६ और बड़े उत्सव से नगर में प्रवेश करना १३६-१३८ षष्ठ पर्व सप्तम पर्व आयु के छह मास बाकी रहने पर ललितांग देव दिग्विजय से लौटकर राजा वदन्त के द्वारा का दुःखी होना और समझाने पर अच्युत श्रीमती पुत्री से कहना कि ललितांग इस समय स्वर्ग की जिनप्रतिमाओं की पूजा करते-करते ' मेरा भानजा है और उससे तेरा तीसरे दिन चैत्य वक्ष के नीचे पञ्च नमस्कार मन्त्र का समागम होगा। १३६-१४७ जाप कर स्वर्ग की आयु का पूर्ण करना १२०-१२२ | पण्डिता धाय के द्वारा ललितांग का वनजंघ के जम्बूद्वीप-पूर्व विदेहक्षेत्र पुष्कलावती देश के रूप में अवतीर्ण होने का वर्णन। चित्रपट को उत्पलखेट नामक नगर में राजा वज्रबाहु और देखकर वज्रजंघ को हुए जातिस्मरण, मूर्जा रानी वसुन्धरा के ललितांगदेव का वनजंघ आदि का निरूपण तथा उस चित्रपट के नाम का पुत्र होना . .. .. १२२-१२४ बदले में अपने पूर्वभव सम्बन्धी चित्रपट का ललितांगदेव की प्रिय वल्लभा स्वयंप्रभा समर्पण १४७-१५४ देवी का जम्बूद्वीप विदेहक्षेत्र, पुण्डरीकिणी बहनोई राजा बज्रबाहु, बहन लक्ष्मीमती और नगरी के राजा वज्रदन्त और लक्ष्मीमती भागिनेय वज्रजंघ का नगर में वज्रदन्त द्वारा रानी के श्रीमती नाम की पुत्री होना १२४-१२६ स्वागत और यथेच्छ वस्तु मांगने को कहना। श्रीमती का यशोधर गुरु के कैवल्य महोत्सव' चक्रवर्ती के आग्रह पर वज्रबाहु के द्वारा पुत्र के लिए जाने वाले देवों को आकाश में जाते वनजंघ के लिए पुत्री श्रीमती की याचना देख पूर्वभव का स्मरण होना और ललितांग और चक्रवर्ती के द्वारा सहर्ष स्वीकृति १५४-१५६
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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