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________________ ६४० कर्मका उपशम करनेवाले आठवेंसे लेकर ११वें गुणस्थानवर्ती जीवोंके परिणाम ११६८९ उपशान्त कषायता - ग्यारहवाँ गुणस्थान १११९० खर्वट-जो सिर्फ पर्वतसे घिरा हो ऐसा ग्राम १६३१७१ खेट-जो नदी और पर्वतसे घिरा हो ऐसा-ग्राम १६.१७१ ऋजुमति-ऋजुमति मन:पर्यय ज्ञान नामक ऋद्धि के धारक इस ऋद्धिका धारक सरल मन वचन कायसे चिन्तित दूसरेके मनमें स्थित रूपी पदार्थोंको जानता है २०६८ कनकावली-एक व्रतका नाम ७३९ कमल - संख्याका एक प्रमाण ३।१०९ करण-सम्यग्दर्शन प्राप्त कराने. वाले भाव। इसके ३ भेद है-१अधःकरण २ अपूर्व करण ३ बनिवृत्तिकरण ९।१२० करणानुयोग-शास्त्रोंका एक भेद जिसमें तीन लोकका वर्णन होता है २।९९ कल्प-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी को मिलाकर बीस कोड़ाकोड़ी सागरका एक कल्प । काल होता है ३।१५ कल्पपादप-कल्पवृक्ष, जिससे मन- चाही वस्तुएं मिलती हैं ३१३८ कामदेव-कामदेव पदका धारक आदिपुराणम् (कुल २४ कामदेव होते हैं) १६९ कायगुप्ति-काय = शरीरको वशमें करना २७७ कायबलिन्-कायबल ऋदिके धारक २०७२ काल-वर्तना लक्षणसे युक्त एक द्रव्य २४।१३९-१४२ फिल्विषिक-देवोंका एक भेद २२।३० कुमुद-संख्याका एक भेद ३।१२६ कुमुदांग-संख्याका एक भेद ३३१३० कंवली-ज्ञानावरण कर्मके क्षयसे प्रकट होनेवाला पूर्णज्ञान जिन्हें प्राप्त हो चुका है। उन्हें अरहन्तसर्वज्ञ अथवा जिनेन्द्र भी कहते है २०६१ केशव-नारायण, ये नौ होते हैं २।११७ कैवल्य-केवलज्ञान, संसारके समस्त पदार्थोको एक साथ जाननेवाला ज्ञान ५।१४९ कोटबुद्धि-कोष्ठबुद्धि ऋद्धिके धारक २०६७ क्षीरनाविन्-क्षीरस्राविणी ऋद्धिके धारक २०७२ क्षेत्र-लोक ४।१४ श्वेल-एक ऋद्धि २०७१ गणधर-तीर्थंकरोंके समवसरणमें रहनेवाले विशिष्ट मुनि । ये चार ज्ञानके धारक होते हैं २।५१ गुण व्रत-जो अणुव्रतोंका उपकार करें। ये तीन है-दिग्वत, देशव्रत और अनर्थदण्डव्रत, कोई-कोई आचार्य भोगोप.. भोग परिमाणको गुणवत और देशव्रतको शिक्षाप्रतमें शामिल करते हैं १०११६२ १४ गुण स्थान-मोह और योगके - निमित्तसे उत्पन्न आत्माके भावोंको गुणस्थान कहते हैं, वे १४ है- १ मिथ्यादृष्टि २ सासादन ३ मिश्र ४ अविरत सम्यग्दृष्टि ५ देशविरत ६ प्रमत्तसंयत ७ अप्रमत्तसंयत ८ अपूर्व करण ९ अनिवृत्तिकरण १० सूक्ष्मसाम्पराय ११ उपशान्त मोह १२ क्षीण. मोह १३ सयोग केवली १४ अयोगकेवली २४।९४ गृहांग-भवनको देनेवाला एक कल्प वृक्ष ३१३९ ग्राम-वह बस्ती जो बाड़से घिरी हुई हो और जिसमें अधिक
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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