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________________ . पचविंशतितमं पूर्व विनेयजनता बन्धुर्विलीनाशेषकल्मषः । वियोगो योगविदुद्विद्वान् विधाता सुविधिः सुधीः ॥ १२५॥ "क्षान्तिभाक् पृथिवीमूर्तिः शान्तिभाक् सलिलात्मकः । वायुमूर्तिरसङ्गगात्मा वह्निमूर्तिरधर्मधक् ॥ १२६॥ जमानामा वा सुत्रामपूजितः । ऋत्विग् यज्ञपतिर्याज्यो यज्ञाङ्गममृतं हविः ॥ १२७ ॥ व्योममूर्तिरमूर्तात्मा' निर्लेपो निर्मलोऽचलः । सोममूर्तिः सुसौम्यात्मा सूर्यमूर्तिर्महाप्रभः ॥ १२८ ॥ ६११ पापोंसे विरत हो चुके हैं इसलिए विरत २२९ कहे जाते हैं, परिग्रहरहित हैं इसलिए असंग २३० कहलाते हैं, एकाकी अथवा पवित्र होनेसे विविक्त २३१ हैं और मात्सर्य से रहित होने के कारण वीतमत्सर २३२ हैं || १२४ || आप अपने शिष्य जनोंके हितैषी हैं इसलिए विनेयजनताबन्धु २३३ कहलाते हैं, आपके समस्त पापकर्म विलीन - नष्ट हो गये हैं इसलिए विलीनाशेषकल्मष २३४ कहे जाते हैं, आप योग अर्थात् मन, वचन, कायके निमित्तसे होनेवाले आत्मप्रदेशपरिस्पन्दसे रहित हैं इसलिए वियोग २३५ कहलाते हैं, योग अर्थात् ध्यानके स्वरूपको जाननेवाले हैं इसलिए योगविद् २३६ कहे जाते हैं, समस्त पदार्थोंको जानते हैं इसलिए विद्वान् ' २३७ कहलाते हैं, धर्मरूप सृष्टिके कर्ता होनेसे विधाता २३८ कहे जाते हैं, आपका कार्य बहुत ही उत्तम है इसलिए सुविधि २३९ कहलाते हैं और आपकी बुद्धि उत्तम है इसलिए सुधी २४० कहे जाते हैं ||१२५|| उत्तम क्षमाको धारण करनेवाले हैं इसलिए क्षान्तिभाकू २४१ कहलाते हैं, पृथिवीके समान सहनशील हैं इसलिए पृथ्वीमूर्ति २४२ कहे जाते हैं, शान्तिके उपासक हैं। इसलिए शान्तिभाकू २४३ कहलाते हैं, जलके समान शीतलता उत्पन्न करनेवाले हैं इसलिए सलिलात्मक २४४ कहे जाते हैं, वायुके समान परपदार्थके संसर्गसे रहित होनेके कारण वायुमूर्ति २४५ कहलाते हैं, परिग्रहरहित होनेके कारण असंगात्मा २४६ कहे जाते हैं, अग्निके समान कर्मरूपी ईंधनको जलानेवाले हैं इसलिए बह्निमूर्ति २४७ हैं, और अधर्मको जलाने वाले हैं इसलिए अधर्मधक २४८ कहलाते हैं || १२६ || कर्मरूपी सामग्रीका अच्छी तरह होम करने से सुयज्वा २४९ हैं, निज स्वभावका आराधन करनेसे यजमानात्मा २५० हैं, आत्मसुखरूप सागर में अभिषेक करनेसे सुत्वा २५१ हैं, इन्द्रके द्वारा पूजित होनेके कारण सुत्रामपूजित २५२ हैं, ज्ञानरूपी यज्ञ करनेमें आचार्य कहलाते हैं इसलिए ऋत्विक् २५३ हैं, यज्ञके प्रधान अधिकारी होनेसे यज्ञपति २५४ कहलाते हैं। पूजाके योग्य हैं इसलिए याज्य २५५ कहलाते हैं, यज्ञके अंग होनेसे यज्ञांग २५६ कहलाते हैं, विषयतृष्णाको नष्ट करनेके कारण अमृत २५७ कहे जाते हैं, और आपने ज्ञानयज्ञमें अपनी ही अशुद्ध परिणतिको होम दिया है इसलिए आप हवि २५८ कहलाते हैं ||१२७|| आप आकाशके समान निर्मल अथवा केवलज्ञानकी अपेक्षा लोक- अलोक में व्याप्त हैं इसलिए व्योममूर्ति २५९ हैं, रूप, रस, गन्ध और स्पर्शसे रहित होने के कारण अमूर्तात्मा २६० हैं, कर्मरूप लेपसे रहित हैं इसलिए निर्लेप २६९ हैं, मलरहित हैं इसलिए निर्मल २६२ कहलाते हैं, सदा एक रूपसे विद्यमान रहते हैं इसलिए अचल २६३ कह जाते हैं, चन्द्रमाके समान शान्त, सुन्दर अथवा प्रकाशमान रहते हैं इसलिए सोममूर्ति २६४ कहलाते हैं, आपकी आत्मा अतिशय सौम्य है इसलिए सुसौम्यात्मा २६५ कहे जाते हैं, सूर्यके समान तेजस्वी हैं इसलिए सूर्यमूर्ति २६६ कहलाते हैं और अतिशय प्रभाके धारक हैं इसलिए १. क्षमाभाक् ततः हेतुभितमिदम् । एवमुत्तरत्रापि योज्यम् । २. शोभनहोता । ३. सुनोतीति सुत्वा, बुन, अभिषवणे । कृताभिषेक इत्यर्थः । ४. पूजकः । ५. अमूर्तात्मत्वात् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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