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________________ पञ्चविंशतितमं पर्व हिरण्यगर्भः श्रीगर्भः प्रभूतविभवोऽभवः । स्वयंप्रभुः प्रभूतात्मा भूतनाथो जगत्पतिः ॥ ११८ ॥ सर्वादिः सर्वत्रिक सार्वः सर्वज्ञः सर्वदर्शनः । सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्ववित् सर्वलोकजित् ॥ ११९ ॥ सुगतिः सुश्रुतः सुश्रुत्सुवाक् सूरिर्बहुश्रुतः । विश्रुतो विश्वतः पादो विश्वशीर्षः शुचिश्रवाः ॥१२०॥ ६०९ जन्म प्रशंसनीय है इसलिए प्रभव १६२ कहे जाते हैं, संसारसे रहित होनेके कारण आप विभव १६३ कहलाते हैं, देदीप्यमान होनेसे भास्वान् १६४ हैं, उत्पाद, व्यय तथा धौव्यरूपसे सदा उत्पन्न होते रहते हैं इसलिए भव १६५ कहलाते हैं, अपने चैतन्यरूप भावमें लीन रहते हैं इसलिए भाव १६६ कहे जाते हैं और संसार भ्रमणका अन्त करनेवाले हैं इसलिए भवान्तक १६७ कहलाते हैं ।।११७।। जब आप गर्भमें थे तभी पृथिवी सुवर्णमय हो गयी थी और आकाशसे देवने भी सुवर्णकी वृष्टि की थी इसलिए आप हिरण्यगर्भ १६८ कहे जाते हैं, आपके अन्तरंगमें अनन्तचतुष्टयरूपी लक्ष्मी देदीप्यमान हो रही हैं इसलिए आप श्रीगर्भ १६९ कहलाते हैं, आपका विभव बड़ा भारी है इसलिए आप प्रभूतविभव १७० कहे जाते हैं, जन्मरहित होनेके कारण अभव १७१ कहलाते हैं, स्वयं समर्थ होनेसे स्वयम्प्रभु १७२ कहे जाते हैं, केवलज्ञानकी अपेक्षा आपकी आत्मा सर्वत्र व्याप्त है इसलिए आप प्रभूतात्मा १७३ हैं, समस्त जीवोंके स्वामी होनेसे भूतनाथ १७४ हैं, और तीनों लोकोंके स्वामी होनेसे जगत्प्रभु १७५ हैं ॥ ११८ ॥ सबसे मुख्य होनेके कारण सर्वादि १७६ हैं, सब पदार्थोंके देखनेके कारण सर्वदृक् १७७ हैं, सबका हित करनेवाले हैं, इसलिए सार्व १७८ कहलाते हैं, सब पदार्थोंको जानते हैं इसलिए सर्वज्ञ १७९ कहे जाते हैं, आपका दर्शन अर्थात् सम्यक्त्व अथवा केवलदर्शन पूर्ण अवस्थाको प्राप्त हुआ है इसलिए आप सर्वदर्शन १८० कहलाते हैं, आप सबका भला चाहते हैं-सबको अपने समान समझते हैं अथवा संसारके समस्त पदार्थ आपके आत्मामें प्रतिबिम्बित हो रहे हैं. इसलिए आप सर्वात्मा १८१ कहे जाते हैं, सब लोगोंके स्वामी हैं, इसलिए सर्वलोकेश १८२ कहलाते हैं, सब पदार्थोंको जानते हैं, इसलिए सर्वविद् १८३ हैं, और समस्त लोकोंको जीतनेवाले हैं-सबसे बढ़कर हैं, इसलिए सर्वलोकजित् १८४ कहलाते हैं ||११|| आपकी मोक्षरूपी गति अतिशय सुन्दर है अथवा आपका ज्ञान बहुत ही उत्तम है इसलिए आप सुगति १८५ कहलाते हैं, अतिशय प्रसिद्ध हैं. अथवा उत्तम 'शास्त्रोंको धारण करनेवाले हैं इसलिए सुश्रुत १८६ कहे जाते हैं, सब जीवोंकी प्रार्थनाएँ सुनते हैं इसलिए सुश्रुत् १८७ कहलाते हैं, आपके बचन बहुत ही उत्तम निकलते हैं इसलिए आप सुवाक् १८८ कहलाते हैं, सबके गुरु हैं अथवा समस्त विद्याओंको प्राप्त हैं। इसलिए सूरि १८९ कहे जाते हैं, बहुत शास्त्रोंके पारगामी होनेसे बहुश्रुत १९० हैं, बहुत प्रसिद्ध हैं अथवा केवलज्ञान होनेके कारण आपका क्षायोपशमिक श्रुतज्ञान नष्ट हो गया है. इसलिए आप विश्रुत १९१ कहलाते हैं, आपका संचार प्रत्येक विषयोंमें होता है अथवा आपकी केवलज्ञानरूपी किरणें संसार में सभी ओर फैली हुई हैं इसलिए आप विश्वतः पाद १९२ कहलाते हैं, लोकके शिखरपर विराजमान हैं इसलिए विश्वशीर्ष १९३ कहे जाते हैं. और आपकी श्रवणशक्ति अत्यन्त पवित्र है इसलिए शुचिश्रवा १९४ कहलाते हैं ||१२०/८ १. हिरण्यं गर्भे यस्य सः । २. सुष्ठु श्रृणोतीति । ३. किरण: । ४. शुचि श्रवो ज्ञानं श्रवणं च यस्य सः । ७७
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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