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________________ आदिपुराणम् जीवः प्राणी च जन्तुश्च क्षेत्रज्ञः पुरुषस्तथा । पुमानास्मान्तरात्मा च ज्ञो ज्ञानीत्यस्य पर्ययाः ॥१०३॥ यतो जीवत्यजीवीच जीविष्यति च जन्मसु । ततो जीवोऽयमाम्नात: सिद्धः स्ता भूतपूर्वतः ॥१०॥ प्राणा दशास्य सन्तीति प्राणी जन्तुश्च जन्ममा । क्षेत्रं स्वरूपमस्य स्यात्तज्ज्ञानात् स तयोच्यते ॥१०॥ पुरुषः पुरु भोगेषु शयनात् परिभाषितः । पुनात्यात्मानमिति च पुमानिति निगद्यते ॥१०॥ मवेष्वतति सातत्याद् एतीत्यास्मा निरुच्यते । सोऽन्तरास्माष्टकर्मान्तर्वर्तिवादभिलप्यते ॥१०॥ ज्ञः स्यामानगुणोपेतो ज्ञानी च तत एव सः। पर्यायशब्दैरेमिस्तु निणयोऽन्यैश्च तद्विधैः ॥१०॥ शाश्वतोऽयं मवेज्जीवः पर्यायस्तु पृथक् पृथक् । मृवग्यस्येव पर्यायैस्तस्योत्पत्ति विपत्तयः ।।१०।। अभूस्वाभाव उत्पादो भूत्वा चामवनं ग्ययः । धौम्यं तु तावस्थ्यं स्यादेवमात्मा त्रिलक्षणः ॥१०॥ एवं धर्माणमारमानमजानानाः कुदृष्टयः । बहुधात्र विमन्वाना' विवदन्ते परस्परम् ।।११।। वस्तुको सामान्यरूपसे ग्रहण करता है इसलिए वह अनाकार-अविकल्पिक उपयोग कहलाता है ॥१०२।। जीव, प्राणी, जन्तु, क्षेत्रज्ञ, पुरुष, पुमान् , आत्मा, अन्तरात्मा, ज्ञ और ज्ञानी ये सब जीवके पर्यायवाचक शब्द हैं ॥१०३॥ चूँकि यह जीव वर्तमान कालमें जीवित है, भूतकालमें भी जीवित था और अनागत कालमें भी अनेक जन्मोंमें जीवित रहेगा इसलिए इसे जीव कहते हैं। सिद्ध भगवान अपनी पूर्वपर्यायों में जीवित थे इसलिए वे भी जीव कहलाते हैं ॥१०४।। पाँच इन्द्रिय, तीन बल, आयु और श्वासोच्छ्वास ये दस प्राण इस जीवके विद्यमान रहते हैं इसलिए यह प्राणी कहलाता है, यह बार-बार अनेक जन्म धारण करता है इसलिए जन्तु कहलाता है, इसके स्वरूपको क्षेत्र कहते हैं और यह उसे जानता है इसलिए क्षेत्रज्ञ भी कहलाता है ।।१०५।। पुरु अर्थात् अच्छे-अच्छे भोगोंमें शयन अर्थात् प्रवृत्ति करनेसे यह पुरुष कहा जाता है और अपने आत्माको पवित्र करता है। इसलिए पुमान भी कहा जाता है ॥१०६।। यह जीव नर-नारकादि पर्यायोंमें अतति अर्थात् निरन्तर गमन करता रहता है इसलिए आत्मा कहलाता है और ज्ञानावरणादि आठ कर्मोके अन्तर्वर्ती होनेसे अन्तरात्मा भी कहा जाता है ॥१०७। यह जीव ज्ञानगुणसे सहित है इसलिए ज्ञ कहलाता है और इसी कारण ज्ञानी भी कहा जाता है, इस प्रकार यह जीव ऊपर कहे हुए पर्याय शब्दों तथा उन्हींके समान अन्य अनेक शब्दोंसे जाननेके योग्य है ।।१०८॥ यह जीव नित्य है परन्तु उसकी नरनारकादि पर्याय जुदी-जुदी है। जिस प्रकार मिट्टी नित्य है परन्तु पर्यायोंकी अपेक्षा उसका उत्पाद और विनाश होता रहता है उसी प्रकार यह जीव नित्य है परन्तु पर्यायोंकी अपेक्षा उसमें भी उत्पाद और विनाश होता रहता है। भावार्थ-द्रव्यत्व सामान्यकी अपेक्षा जीव द्रव्य नित्य है और पर्यायोंकी अपेक्षा अनित्य है। एक साथ दोनों अपेक्षाओंसे यह जीव उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यरूप है ॥१०९॥ जो पर्याय पहले नहीं थी उसका उत्पन्न होना उत्पाद कहलाता है, किसी पर्यायका उत्पाद होकर नष्ट होजाना व्यय कहलाता है और दोनों पर्यायों में तदवस्थ होकर रहना ध्रौव्य कहलाता है, इस प्रकार यह आत्मा उत्पाद, व्यय तथा धौव्य इन तीनों लक्षणोंसे सहित है ॥११०।। ऊपर कहे हुए स्वभावसे युक्त आत्माको नहीं जानते हुए १. भवेत् । २. पूर्वस्मिन् काले जीवनात् । ३. क्षेत्रज्ञ इत्युच्यते । ४. बहु । ५. अतति इति कोऽर्थः । सातत्यात् अनिःस्यूतवृत्त्यातिगच्छतीत्यर्थः। ६. नि योऽन्यैश्च । ७. उत्पत्तिनाशाः। ८. उत्पत्तिव्यययोः स्थितिः। ९. विपरीतं मन्वानाः । १०. विपरीतं जानन्ति ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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