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________________ त्रयोविंशं पर्व देवोऽर्हन्प्राङ्मुखो वा 'नियतिमनुसर म्नुत्तराशामुखो वा 3 मध्यास्ते स्म पुण्यां समवसृतिमहीं तां परस्याध्यवात्सुः । प्रादक्षिण्येन धोन्द्रा युवतिगणिनी नृस्त्रियस्त्रिश्च देव्यो देवाः सेन्द्राश्च मर्त्याः पशवं इति गणा द्वादशामी क्रमेण ॥ १९३॥ योगीन्द्रा रुन्द्रबोधा विबुधयुवतयः सार्यका राजपत्म्यो ज्योतिर्वन्येशकन्या भवनजवनिता भावना व्यन्तराश्च । ज्योतिष्काः कल्पनाथा नरवरवृषभास्तिर्यगौघैः सहामी कोष्ठेषूक्तेष्वतिन् जिनपतिमभितो भक्तिमारावनम्राः ॥ १९४ ॥ प्रादुःध्य द्वाङ्मयूखैर्विघटिततिमिरो धूतसंसाररात्रि किमुपघटयन् 'क्षणमोहीमवस्थाम् । सज्ज्ञानोदग्रसादि 'प्रतिनियत' 'नयोद्वेगसप्ति' प्रयुक्त स्याद्वादस्यन्दनस्थो भृशमथ रुरुचे मध्यबन्धुर्जिनाकः ॥ १९५॥ ५७१ दूसरा अशोक आदिका वन है, उसके आगे वेदिका है, तदनन्तर ध्वजाओंकी पंक्तियाँ हैं, फिर दूसरा कोट है, उसके आगे वेदिकासहित कल्पवृक्षोंका वन है, उसके बाद स्तूप और स्तूपोंके बाद मकानोंकी पंक्तियाँ हैं, फिर स्फटिकमणिमय तीसरा कोट है, उसके भीतर मनुष्य, देव और मुनियोंको बारह सभाएँ हैं तदनन्तर पीठिका है और पीठिकाके अग्रभागपर स्वयम्भू भगवान् अरहन्तदेव विराजमान हैं। । १९२ || अरहन्तदेव स्वभावसे ही पूर्व अथवा उत्तर दिशाकी ओर मुख कर जिस समवसरणभूमिमें विराजमान होते हैं उसके चारों ओर प्रदक्षिणारूपसे क्रमपूर्वक १ बुद्धिके ईश्वर गणधर आदि मुनिजन, २ कल्पवासिनी देवियाँ, ३ आर्यिकाएँमनुष्योंकी स्त्रियाँ, ४ भवनवासिनी देवियाँ, ५. व्यन्तरणी देवियाँ, ६ ज्योतिष्किणी देवियाँ, ७ भवनवासी देव, ८ व्यन्तर देव, ९ ज्योतिष्क देव, १० कल्पवासी देव, ११ मनुष्य और १२ पशु इन बारह गणोंके बैठने योग्य बारह सभाएँ होती हैं ॥ १९३ | | उनमें से पहले कोठेमें अतिशय ज्ञानके धारक गणधर आदि मुनिराज, दूसरेमें कल्पवासी देवोंकी देवांगनाएँ, तीसरेमें आर्यिकासहित राजाओंकी स्त्रियाँ तथा साधारण मनुष्योंकी स्त्रियाँ, चौथेमें ज्योतिष देवोंकी देवांगनाएँ, पाँचवेंमें व्यन्तर देवोंकी देवांगनाएँ, छठेमें भवनवासी देवोंकी देवांगनाएँ, सातवेंमें भवनवासी देव, आठवेंमें व्यन्तरदेव, नवेंमें ज्योतिषी देव, दसवेंमें कल्पवासी देव, ग्यारहवेंमें चक्रवर्ती आदि श्रेष्ठ मनुष्य और बारहवें में पशु बैठते हैं । ये सब ऊपर कहे हुए कोठोंमें भक्तिभारसे नम्रीभूत होकर जिनेन्द्र भगवान्‌के चारों ओर बैठा करते हैं ॥ १९४॥ तदनन्तर जिन्होंने प्रकट होते हुए वचनरूपी किरणोंसे अन्धकारको नष्ट कर दिया है, संसाररूपी रात्रिको दूर हटा दिया है और उस रात्रिकी सन्ध्या सन्धिके समान क्षीण मोह नामक बारहवे गुणस्थानको अवस्थाको भी दूर कर दिया है जो सम्यग्ज्ञानरूपी उत्तम सारथिके द्वारा वशमें किये हुए सात नयरूपी वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए स्याद्वादरूपी रथपर १. स्वभावं । २. अनुगच्छन् । ३. अधिवासं कुर्वन्ति स्म । ४. गणधरादिमुनयः । ५. कल्पवासिस्त्री । ६. भवनत्रयदेव्यः । ७. ज्योतिष्कव्यन्तरदेव्यः | ८. प्रकटो भवत्स्याद्वादवाविकरणैः । ९ तद्रात्रेः संध्यायाः संधिः संबन्धस्तेन कल्पां सदृशाम् प्रातःकालसंध्यामित्यर्थः । १०. क्षोणमोहसंबन्धिनीम् । क्षीणमोहाम् इ० । ११. सारथिः । १२. प्रतिनियमित । १३. वेगवत्तुरग ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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