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________________ त्रयोविंशं पर्व दोधकवृत्तम् दिप्यमहाध्वनिरस्य मुखाब्जान्मेघरवानुकृतिर्निरगच्छत् । भग्यमनोगतमोहतमोन सद्युतदेष यथैव तमोऽरिः ॥६९॥ एकतयोऽपि च सर्वनृभाषाः सोऽन्तरनेट बहूश्च कुमाषाः । अप्रतिपत्तिमपास्य च तत्वं बोधयति स्म जिनस्य महिम्ना ॥७०॥ एकतयोऽपि तथैव जलौघश्चित्ररसौ भवति गुमभेदात् । पात्रविशेषवशाच्च तथायं सर्वविदो ध्वनिराप बहुरवम् ॥७॥ एकतयोऽपि यथा स्फटिकाश्मा यदयदुपाहितमस्य विमासम् । स्वच्छता स्वयमप्यनुधत्ते 'विश्वबुधोऽपि तथा ध्वनिरुच्चैः ॥७२॥ देवकृतो ध्वनिरि"त्यसदेतद् देवगुणस्य तथा विहतिः स्यात् । साक्षर एव च वर्णसमूहान्नैव विनार्थगतिर्जगति स्यात् ॥७३॥ शालिनीवृत्तम् इत्थंभूता "देवराविश्वमतुर्मक्त्या देवैः कारयामास भूतिम् । दिग्यास्थानी देवराजोपसम्यामध्यास्तैना "श्रीपतिर्विश्वरश्वा ॥७॥ चन्द्रमाके समान था और प्रभामण्डल सूर्यके समान था ॥६८॥ भगवानके मुखरूपी कमलसे बादलोंकी गर्जनाका अनुकरण करनेवाली अतिशययुक्त महादिव्यध्वनि निकल रही थी और वह भव्य जीवोंके मनमें स्थित मोहरूपी अंधकारको नष्ट करती हुई सूर्यके समान सुशोभित हो रही थी ॥६९।। यद्यपि वह दिव्यध्वनि एक प्रकारकी थी तथापि भगवान्के माहात्म्यसे समस्त मनुष्योंकी भाषाओं और अनेक कुभाषाओंको अपने अन्तर्भूत कर रही थी अर्थात् सर्वभाषारूप परिणमन कर रही थी और लोगोंका अज्ञान दूर कर उन्हें तत्त्वोंका बोध करा रही थी ॥७०।। जिस प्रकार एक ही प्रकारका जलका प्रवाह वृक्षोंके भेदसे अनेक रसवाला हो जाता है उसी प्रकार सर्वज्ञदेवको वह दिव्यध्वनि भी पात्रोंके भेदसे अनेक प्रकारकी हो जाती थी॥७शा अथवा जिस प्रकार स्फटिक मणि एक ही प्रकारका होता है तथापि उसके पास जो-जो रंगदार पदार्थ रख दिये जाते हैं वह अपनी स्वच्छतासे अपने आप उन-उन पदार्थोके रंगोंको धारण कर लेता है उसी प्रकार सर्वज्ञ भगवान्की उत्कृष्ट दिव्यध्वनि भी यद्यपि एक प्रकारकी होती है तथापि श्रोताओंके भेदसे वह अनेक रूप धारण कर लेती है ।।७२॥ कोई कोई लोग ऐसा कहते हैं कि वह दिव्यध्वनि देवोंके द्वारा की जाती है परन्तु उनका वह कहना मिथ्या है क्योंकि वैसा माननेपर भगवान्के गुणका घात हो जायेगा अर्थात् वह भगवानका गुण नहीं कहलायेगा, देवकृत होनेसे देवोंका कहलायेगा। इसके सिवाय वह दिव्यध्वनि अक्षररूप ही है क्योंकि अक्षरोंके समूहके बिना लोकमें अर्थका परिज्ञान नहीं होता ॥७३॥ . इस प्रकार तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् वृषभदेवकी ऐसी विभूति इन्द्रने भक्तिपूर्वक देवोंसे करायी थी, और अनन्तचतुष्टयरूप लक्ष्मीके अधिपति सर्वज्ञदेव इन्द्रोंके द्वारा सेवनीय १. अनुकारी। २. हन्तीति घ्नन् । ३. एकप्रकारः । ४. अन्तर्नयति स्म । ५. अज्ञानम् । ६. समीपमागतम् । ७. उपाहितद्रव्यस्य । ८. कान्तिम् । ९. विश्वज्ञानिनः । १०. सर्वज्ञकृतः। ११. असत्यम् । १२. तथा सति । १३. इन्द्रः । १४. समवसतिम् । १५. इन्द्रसेवनीयाम । १६. अधितिष्ठति स्म। -
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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