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________________ 2 . 3 एकविंशं पर्व 'सुषुप्तसदृशो मुक्तः स्यादित्येवं वाणकः । सुषुप्सत्येष मूढारमा ध्येयतत्त्वविचारणे ॥२५२॥ शेषेष्वपि प्रवादेषु न ध्यानध्येयनिर्णयः । एकान्तदोषदुष्टत्वाद् द्वैताद्वैतादिवादिनाम् ॥२५३॥ निस्यानिस्यात्मकं जीवतत्त्वमभ्युपगच्छताम् । ध्यानं स्याद्वादिनामेव घटते नान्यवादिनाम् ।।२५४॥ विरुद्ध धर्मयोरेकं वस्तु नाधारतां व्रजेत् । इति चेनार्पणा भेदादविरोधप्रसिद्धितः ॥२५५।। निस्यो द्रव्यार्पणादात्मा" न पर्यायभिदार्पणात् । भनित्यः पर्ययोत्पादविनाशैद्रव्यतो न तु ॥२५६॥ देवदत्तः पिता च स्यात् पुत्रश्चैवार्पणावशात् । "विपभेतरयोर्योगः स्याद् वस्तुन्युमयात्मनि ॥२५७॥ जिनप्रवचनाभ्यासप्रसरबोधसंपदाम् । युक्तं स्याद्वादिना ध्यानं नान्येषां तं स्याहादिना ध्यानं नान्येषां दर्दशामिदम ॥२५८॥ जिनो मोहारिविजयादाप्तः स्याद् वीतधीमकः । वाचस्पतिरसौ वाग्भिः सन्मार्गप्रतिबोधनात् ॥२५९॥ नहीं हो सकती, और ऐसी दशामें वह मुक्तात्मा ध्येय भी नहीं कहला सकता तथा ध्येयके बिना ध्यान भी सिद्ध नहीं हो सकता ॥२५१॥ जो सांख्यमतावलम्बी ऐसा कहते हैं कि मुक्त जीव गाढ़ निद्रामें सोये हुए पुरुषके समान अचेत रहता है, मालूम होता है कि वे ध्येयतत्त्वका विचार करते समय स्वयं सोना चाहते हैं अर्थात् अज्ञानी बने रहना चाहते हैं इस तरह सांख्यमतमें ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती ॥२५२।। इसी प्रकार द्वैतवादी तथा अद्वैतवादी लोगोंके जो मत शेष रह गये हैं वे सभी एकान्तरूपी दोषसे दूषित हैं इसलिए उन सभीमें ध्यान और ध्येयका कुछ भी निर्णय नहीं हो सकता है ।।२५।। इसलिए जीक्तत्त्वको नित्य और अनित्य दोनों ही रूपसे माननेवाले स्याद्वादी लोगोंके मतमें ही ध्यानकी सिद्धि हो सकती है अन्य एकान्तवादी लोगोंके मतमें नहीं हो सकती ।।२५४|| कदाचित् यहाँ कोई कहे कि एक ही वस्तु दो विरुद्ध धमोंका आधार नहीं हो सकती अर्थात् एक ही जीव नित्य और अनित्य नहीं हो सकता तो उसका यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि विवक्षाके भेदसे वैसा कहने में कोई विरोध नहीं आता। यदि एक ही विवक्षासे दोनों विरुद्ध धर्म कहे जाते तो अवश्य ही विरोध आता परन्तु यहाँ अनेक विवक्षाओंसे अनेक धर्म कहे जाते हैं इसलिए कोई विरोध नहीं मालम होता। जीवतत्त्व द्रव्यकी विवक्षासे नित्य है न कि पर्यायके भेदोंकी विवक्षासे भी । इस प्रकार वही जीवतत्त्व पर्यायोंके उत्पाद और विनाशकी अपेक्षा अनित्य है न कि द्रव्यकी अपेक्षासे भी। जिस प्रकार एक ही देवदत्त विवक्षाके वशसे पिता और पुत्र दोनों ही रूप होता है उसी प्रकार एक ही वस्तु विवक्षाके कशसे नित्य तथा अनित्य दोनों रूप ही होती है। देवदत्त अपने पुत्रको अपेक्षा पिता है और अपने पिताकी अपेक्षा पुत्र है इसी प्रकार संसारकी प्रत्येक वस्तु द्रव्यकी अपेक्षा नित्य है और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य है। इससे सिद्ध होता है कि वस्तुमें दोनों विरुद्ध धर्म पाये जाते हैं परन्तु उनका समावेश विवक्षा और अविवक्षाके वशसे ही होता है ॥२५५-२५०। इसलिए जैन शास्त्रोंके अभ्याससे जिनकी ज्ञानरूपी सम्पदा सभी ओर फैल रही है ऐसे स्याद्वादी लोगोंके मतमें ही ध्यानकी सिद्धि हो सकती है अन्य मिथ्यादृष्टियोंके मतमें नहीं ।।२५८।। भगवान् अरहन्त देवने मोहरूपी शत्रुपर विजय प्राप्त कर ली है इसलिए वे जिन कहलाते हैं उनकी बुद्धिका समस्त मल नष्ट हो गया है इसलिए वे आप्त कहलाते हैं और उन्होंने अपने वचनों द्वारा सर्वश्रेष्ठ मोक्षमार्गका उपदेश १. भृशं निद्रावशगतसदृशः। २. कुत्सितं ब्रुवाणः सांख्यः । ३. स्वपितुमिच्छति । ४. परमतेषु । ५. सर्वथाऽभेदवादिनामादिशब्दादनुक्तानामपि शून्यवादिनाम् । ६. अनुमन्त्रिणाम् । ७. शीतोष्णवत् नित्यानित्यरूपयोरिति । ८. "सिंहो माणवकः' इत्यर्पणाभेदात् । ९. द्रव्यनिरूपणात् । १०. द्रव्यापणाच्चात्मा ६०, ल., म० । ११. भेद । १२. नित्यानित्ययोः । १३. नित्यानित्यात्मनि ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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