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________________ ५०० आदिपुराणम् अणिमादिगुणयुक्तमैश्वर्य परमोदयम् । भुक्त्वेहैव पुनर्मुक्त्वा मुनिनिर्वाति योगवित् ॥२३॥ बोजान्येतान्यजानानो नाममात्रेण मन्त्रवित् । मिथ्याभिमानोपहतो बध्यते कर्मबन्धनैः ॥२३९॥ नित्यो वा स्यादनिस्यो वा जीवो योगामि मानिनाम् । नित्यश्चेदवि कार्यत्वास ध्येयध्यानसंगतिः ॥२४॥ "सुखासुखानुभवनस्मरणेच्छाचसंभवात् । प्रागेवास्य न दिध्यासा दूरात्तस्वानुचिन्तनम् ॥२१॥ तमि वृत्तौ कुतो ध्यानं कुतस्त्यो वा फलोदयः। बन्धमोक्षायधिष्ठाना प्रक्रियाप्यफला ततः ॥२४॥ मणिकानां च चित्तानां सन्ततौ कानुमा बना । ध्यानस्य स्वानुभूतार्थस्मृतिरेवात्र"दुर्घटा ॥२३॥ "सन्तानान्तरवत्तस्मा दिध्यासादिसंभवः । न ध्यानं न च निर्मोक्षो नाप्य स्याष्टाङ्गभावना ॥२४॥ ऋद्धियोंकी प्राप्ति होना गौण फल है ।।२३७॥ योगको जाननेवाला मुनि अणिमा आदि गुणोंसे युक्त तथा उत्कृष्ट उदयसे सुशोभित इन्द्र आदिके ऐश्वर्यका इसी संसारमें उपभोग करता है और बादमें कर्मबन्धनसे छूटकर निर्वाण स्थानको प्राप्त होता है ।।२३८।। इन ऊपर कहे हुए बीजोंको न जानकर जो नाम मात्रसे ही मन्त्रवित् ( मन्त्रोंको जाननेवाला) कहलाता है और झूठे अभिमानसे दग्ध होता है वह सदा कर्मरूपी बन्धनोंसे बँधता रहता है ॥२३९।। अब यहाँसे अन्य मतावलम्बी लोगोंके द्वारा माने गये योगका निराकरण करते हैं-योगका अभिमान करनेवाले अर्थात् मिथ्या योगको भी यथार्थ योग माननेवालोंके मतमें जीव पदार्थ नित्य है ? अथवा अनित्य ? यदि नित्य है तो वह अविकार्य अर्थात् विकार (परिणमन ) से रहित होगा और ऐसी अवस्था में उसके ध्येयके ध्यानरूपसे परिणमन नहीं हो सकेगा। इसके सिवाय नित्य जीवके सुख-दुःखका अनुभव स्मरण और इच्छा आदि परिणमनोंका होना भी असम्भव है इसलिए जब इस जीवके सर्वप्रथम ध्यानकी इच्छा ही नहीं हो सकती तब तत्त्वोंका चिन्तन तो दूर ही रहा । और तत्त्व-चिन्तनके बिना ध्यान कैसे हो सकता है ? ध्यानके बिना फलकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? और उसके बिना बन्ध तथा मोक्षके कारणभूत समस्त क्रियाकलाप भी निष्फल हो जाते हैं ॥२४०-२४२॥ यदि जीवको अनित्य माना जाये तो क्षण-क्षणमें नवीन उत्पन्न होनेवाली चितोंकी सन्ततिमें ध्यानकी भावना ही नहीं हो सकेगी क्योंकि इस क्षणिक वृत्तिमें अपने-द्वारा अनुभव किये हुए पदार्थोंका स्मरण होना अशक्य है। भावार्थ-यदि जीवको सर्वथा अनित्य माना जाये तो ध्यानकी भावना ही नहीं हो सकती क्योंकि ध्यान करनेवाला जीव क्षण-क्षणमें नष्ट होता रहता है। यदि यह कहो कि जीव अनित्य है किन्तु वह नष्ट होते समय अपनी सन्तान छोड़ जाता है इसलिए कोई बाधा नहीं आती परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि जब जीवका निरन्वय नाश हो जाता है तब यह उसकी सन्तान है, ऐसा व्यवहार नहीं हो सकता और किसी तरह उसकी सन्तान है ऐसा व्यवहार मान भी लिया जाये तो 'सब क्षणिक है' इस १. कर्ममलमुक्त्वा । २. मुक्तो भवति । ३. नाममात्राणि द०। ४. अयोगे योगबुद्धि : योगाभिमानः तद्वतां योगानाम् । ५. सर्वथा नित्यः । ६. अपरिणामित्वात् । ध्येयध्यानसंयोगाभावमेव प्रतिपादयति । ७. सुखदुःखानुभवनमनुभूतार्थे स्मृतिरिति वचनात्, स्मरणमपि सुखाभिलाषिप्रभृतिकम् , नित्यस्यासंभवात् । ८. सर्वथानित्यजीवतत्त्वस्य । ९. ध्यातुमिच्छा । १०. तत्त्वानुचिन्तनाभावे । ११. कुत आगतः । १२. शभाशुभकर्मविवरणम् । १३. कारणात् । १४. सामर्थ्यम् । १५. क्षणिकरूपचित्ते। १६. देवदत्तचित्तसन्तानं प्रति यज्ञदत्तचित्तसन्तानवत् । १७. कारणात् । १८. दिध्यासाद्यभावात् ध्यानमपि न संभवति । १९. ज्ञानाभावात् मोक्षोऽपि न संभवति । २० मोक्षस्य । २१. सम्यक्त्वसंज्ञा, संज्ञिवाक्कायकान्तायामस्मतिरूपाणामष्टाङ्गानां भावनापि न संभवति । चार्वाकमते ध्यानं न संगच्छत इत्याह ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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