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________________ ४९८ आदिपुराणम् ततस्तमृषयो भक्त्या गौतमं कृतवन्दनाः । पप्रच्छुरिनि योगीन्द्रं योगवैधानि' कानिचित् ॥२१७॥ भगवन् योगशास्त्रस्य तत्वं त्वत्तः श्रुतं मुहुः । इदानी बोन्बुमिच्छामस्त दिगन्तरशोधनम् ॥२१८॥ तदस्य ध्यानशास्त्रस्य यास्ता विप्रतिपत्तयः । निराकुरुष्व ता देव भास्वानिव तमस्ततीः ॥२९॥ ऋद्धिप्राप्तऋषिस्त्वं हि त्वं हि प्रत्यक्षविन्मुनिः । अनगारोऽस्य संगत्वाद् यतिः श्रेणीद्वयोन्मुखः ॥२२०॥ ततो भागवतादीनां योगानामभिभूतये । ब्रहि नो योगबीजानि" हेत्वाज्ञाभ्यो' यथाश्रुतम् ॥२२॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा भगवान् स्माह गौतमः । यस्पृष्टं योगतत्वं वः कथयिष्यामि तस्फुटम् ॥२२२॥ षड्भेद योगवादी यः सोऽनुयोज्यः समाहितैः । योगः कः किं समाधान प्राणायामश्च कीदृशः ॥२२३॥ का धारणा किमाध्यानं किं ध्येयं कीदृशी स्मृतिः । किं फलं कानि बीजानि प्रत्याहारोऽस्य' कीदृशः ॥ कायवाङमनसां कर्म योगो योगविदां मतः । स"शुभाशमभेदेन मिन्नो द्वैविध्यमश्नुते ॥२२५॥ यत्सम्यकपरिणामेषु चित्तस्या धानमञ्जसा । स समाधिरिति ज्ञेयः स्मृतिर्वा परमेष्टिनाम् ॥२२६॥ प्राणायामो मवेद् योगनिग्रहः शुभमावनः । धारणा श्रतनिर्दिष्टबीजानामवधारणम् ॥२२॥ तदनन्तर भक्तिपूर्वक वन्दना करनेवाले ऋषियोंने योगिराज गौतम गणधरसे नीचे लिखे अनुसार और भी कुछ ध्यानके भेद पूछे ।।२१७॥ कि हे भगवन् , हम लोगोंने आपसे योगशास्त्रका रहस्य अनेक बार सुना है, अब इस समय आपसे अन्य प्रकारके ध्यानोंका निराकरण जानना चाहते हैं ।।२१८॥ हे देव, जिस प्रकार सूर्य अन्धकारके समूहको नष्ट कर देता है उसी प्रकार आप भी इस ध्यानशास्त्रके विषयमें जो कुछ भी विप्रतिपत्तियाँ ( बाधाएँ ) हैं उन सबको नष्ट कर दीजिए ।।२१९॥ हे स्वामिन् , अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त होनेसे आप ऋषि कहलाते हैं, आप अनेक पदार्थोंको प्रत्यक्ष जाननेवाले मुनि हैं, परिग्रहरहित होनेके कारण आप अनगार कहलाते हैं और दोनों श्रेणियोंके सम्मुख हैं इसलिए यति कहलाते हैं ॥२२०।। इसलिए भागवत आदिमें कहे हुए योगोंका पराभव (निराकरण) करनेके लिए युक्ति और शास्रके अनुसार आपने जैसा सुना है वैसा ही हम लोगोंके लिए योग ( ध्यान ) के समस्त बीजों ( कारणों अथवा बीजाक्षरों) का निरूपण कीजिए ।।२२।। इस प्रकार उन ऋषियोंके ये वाक्य सुनकर भगवान् गौतम स्वामी कहने लगे कि आप लोगोंने जो योगशास्त्रका तत्त्व अथवा रहस्य पूछा है उसे मैं स्पष्ट रूपसे कहूँगा ॥२२२॥ जो छह प्रकारसे योगोंका निरूपण करता है ऐसे योगवादीसे विद्वान् पुरुपोंको पूछना चाहिए कि योग क्या है ? समाधान क्या है ? प्राणायाम कैसा है ? धारणा क्या है ? आध्यान ( चिन्तवन ) क्या है ? ध्येय क्या है ? स्मृति कैसी है ? ध्यानका फल क्या है ? ध्यानके बीज क्या हैं ? और इसका प्रत्याहार कैसा ? है ।।२२३-२२४॥ योगके जाननेवाले विद्वान् काय, वचन और मनकी क्रियाको योग मानते हैं, वह योग शुभ और अशुभके भेदसे दो भेदोंको प्राप्त होता है ॥ २२५ ।। उत्तम परिणामोंमें जो चित्तका स्थिर रखना है वही यथार्थमें समाधि या समाधान कहलाता है अथवा पंच परमेष्ठियोंके स्मरण को भी समाधि कहते है AER६|मन, वचन और काय इन तीनों योगोंका निग्रह करना तथा शुभभावना रखना प्राणायाम कहलाता है और शास्त्रोंमें बतलाये हुए बीजाक्षरीका अवधारण करना धारणा १. ध्यानभेदान् । २. ध्यान । ३. स्वरूपम् । ४. योगमागन्तिरनिराकरणम् । ५. तत् कारणात् । ६. प्रतिकूलाः । ७. हि पादपूरणे। ८. वैष्णवादीनाम् । ९. ध्यानानाम् । १०. ध्याननिमित्तानि । ११. युक्त्यागमपरमागमाभ्याम् । १२. च ल., म०, अ०। १३. संयोगः, संयुक्तसमवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवाया समवेतसमवायः, विशेषणविशेष्यभावश्चेति षड्प्रकारयोगान् वदतीति । १४. योगः। १५. प्रष्टव्यः । १६. समाधिः। १७. योगस्य । योगादेवक्ष्यमाणलक्षणलक्षितत्वात् तन्न तव संभवतीति स्वमतं प्रतिष्ठापयितुमाह । १८. योगः । १९. धारणा।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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