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________________ एकविंशं पर्व ४८३ ततो विविक्तशायित्वं वने वासश्च योगिनाम् । इति साधारणो मार्गों जिनस्थविरकल्पयोः ॥ ७९ ॥ इत्यमुष्यां व्यवस्थायां सत्यां धीरास्तु केचन । विहरन्ति जनाकीर्णे शून्ये च समदर्शिनः ॥ ८० ॥ न चाहोरात्रसंध्यादिलक्षणः कालपर्ययः । नियतोऽस्यास्ति 'दिध्यासोस्तदधानं' सार्वकालिकम् ॥८१॥ "यह शकालचेष्टासु सर्वास्येव समाहिताः । सिद्धाः ' सिद्धयन्ति सेत्स्यन्ति नात्र " तनियमोऽस्यतः ॥ ८२ ॥ यदा यत्र यथावस्थो योगी ध्यानमवाप्नुयात् । स कालः स च देशः स्याद् ध्यानावस्था च सा मता ॥ ८३ ॥ प्रोक्ता ध्यातुरवस्थेयमिदानीं " तस्य लक्षणम् । ध्येयं ध्यानं फलं चेति "वाध्यमेतच्चतुष्टयम् ॥८४॥ वज्रसंहननं कायमुद्वहन् बलवत्तमम् । भध शूरस्तपोयोगे स्वभ्यस्त श्रुतविस्तरः ॥ ८५ ॥ दूरोत्सारितदुर्ष्यानो दुर्लेश्याः परिवर्जयन् । लेश्याविशुद्धिमालम्ब्य भावयचप्रमत्तताम् ॥८६॥ प्रज्ञापारमितो योगी ध्याता स्याद्धोबलान्वितः । "सूत्रार्थालम्बनो धीरः सोढाशेषपरीषहः ॥८७॥ (त्रिभिर्विशेषकम् ) ||१८|| इसलिए मुनियोंको एकान्त स्थानमें ही शयन करना चाहिए और वनमें ही रहना चाहिए। यह जिनकल्पी और स्थविरकल्पी दोनों प्रकारके मुनियोंका साधारण मार्ग है ||३९|| यद्यपि मुनियोंके निवास करनेके लिए यह साधारण व्यवस्था कही गयी है तथापि कितने ही समदर्शी धीर-वीर मुनिराज मनुष्योंसे भरे हुए शहर आदि तथा वन आदि शून्य (निर्जन ) स्थानों में विहार करते हैं ॥ ८०॥ इसी प्रकार ध्यान करनेके इच्छुक धीर-वीर मुनियोंके लिए दिन-रात और सन्ध्याकाल आदि काल भी निश्चित नहीं है अर्थात् उनके लिए समयका कुछ भी नियम नहीं है क्योंकि वह ध्यानरूपी धन सभी समय में उपयोग करने योग्य है अर्थात् ध्यान इच्छानुसार सभी समयोंमें किया जा सकता है ॥८१॥ क्योंकि सभी देश, सभी काल और सभी चेष्टाओं ( आसनों) में ध्यान धारण करनेवाले अनेक मुनिराज आज तक सिद्ध हो चुके हैं, अब हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे इसलिए ध्यानके लिए देश, काल और आसन वगैरह का कोई खास नियम नहीं है ॥ ८२॥ जो मुनि जिस समय, जिस देशमें और जिस आसन से ध्यानको प्राप्त हो सकता है उस मुनिके ध्यानके लिए वही समय, वही देश और वही आसन उपयुक्त माना गया है ॥८३॥ इस प्रकार यह ध्यान करनेवालेकी अवस्थाका निरूपण किया । अब ध्यान करनेवालेका लक्षण, ध्येय अर्थात् ध्यान करने योग्य पदार्थ, ध्यान और ध्यानका फल ये चारों ही पदार्थ निरूपण करने योग्य हैं ॥८४॥ जो वज्रवृषभनाराचसंहनन नामक अतिशय बलवान् शरीरका धारक है, जो तपश्चरण करने में अत्यन्त शूर-वीर है, जिसने अनेक शास्त्रोंका अच्छी तरहसे अभ्यास किया है, जिसने आर्त और रौद्र नामके खोटे ध्यानोंको दूर हटा दिया है, जो अशुभ लेश्याओंसे बचता रहता है, जो लेश्याओंकी विशुद्धताका अवलम्बन कर प्रमादरहित अवस्थाका चिन्तवन करता है, बुद्ध को प्राप्त हुआ है अर्थात् जो अतिशय बुद्धिमान् है, योगी है, जो बुद्धिबलसे सहित है, शास्त्रोंके अर्थका आलम्बन करनेवाला है, जो धीर-वीर है और जिसने समस्त परीषहों- १. कारणात् । २. एकान्तप्रदेश । ३. जनभरितप्रदेशे । ४. ध्यातुमिच्छोः । ५ तद्धनम् म०, ल० ॥ ६. यस्मात् कारणात् । ७ समाधानयुक्ताः । ८ सिद्धपरमेष्ठिनो बभूवुरित्यर्थः । ९. सिद्धाः भविष्यन्ति । १०. तद्देशकालादिनियमः । ११. आसनभेदः । १२. वक्तव्यम् । १३. समूहे शूरः । मुनिसमूहे शूरः । संवत्समृद्ध इत्यर्थः । उद्यत्सूर: ल०, म० द० । उद्यसूर: इ० । १४. आगमार्थाश्रयः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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