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________________ एकविंश पर्व धीब लायत्तवृत्तिस्वाद् ध्यानं तनिरुज्यते । यथार्थममि संधानादपध्या नमतोऽन्यथा ॥११॥ योगो ध्यानं समाधिश्च धोरोधःस्वान्तनिग्रहः । अन्तःसंलीनता चेति तत्पर्यायाः स्मृता बुधैः ॥१२॥ ध्यायत्यर्थाननेनेति ध्यानं करणसाधनम् । ध्यायतीति च कर्तृवं वाच्यं स्वातन्यसंभवात् ॥१३॥ भावमात्रामिधिस्सायां 'ध्याति, ध्यानमिष्यते । शक्तिभेदाज्ज्ञतत्व"स्य युक्तमेकत्र तत् त्रयम् ॥१४॥ यद्यपि ज्ञानपर्यायो ध्यानाख्यो ध्येयगोचरः। तथाप्येकापसंदष्टो" धत्ते बोधादि वान्यताम् ॥१५॥ से होनेवाले आस्रवका निरोध करनेके लिए उपचारसे माना जाता है ॥१०॥ ध्यानके स्वरूपको जाननेवाले बुद्धिमान पुरुष ध्यान उसीको कहते हैं जिसकी वृत्ति अपने बुद्धि-बलके अधीन होती है क्योंकि ऐसा ध्यान ही यथार्थमें ध्यान कहा जा सकता है इससे विपरीत ध्यान अपध्यान कहलाता है ।।११।। योग, ध्यान, समाधि, धीरोध अर्थात् बुद्धिको चञ्चलता रोकना, स्वान्त निग्रह अर्थात् मनको वशमें करना, और अन्तःसंलीनता अर्थात् आत्माके स्वरूपमें लीन होना आदि सब ध्यानके ही पर्यायवाचक शब्द हैं-ऐसा विद्वान् लोग मानते हैं ॥१२॥ आत्मा जिस परिणामसे पदार्थका चिन्तवन करता है उस परिणामको ध्यान कहते हैं यह करणसाधनकी अपेक्षा ध्यान शब्दकी निरुक्ति है । आत्माका जो परिणाम पदार्थोंका चिन्तबन करता है उस परिणामको ध्यान कहते हैं यह कर्तृ-वाच्यकी अपेक्षा ध्यान शब्दकी निरुक्ति है क्योंकि जो परिणाम पहले आत्मा रूप कर्ताके परतन्त्र होनेसे करण कहलाता था वही अब स्वतन्त्र होनेसे कर्ता कहा जा सकता है। और भाव-वाच्यको अपेक्षा करनेपर चिम्तवन करना ही ध्यानकी निरुक्ति है। इस प्रकार शक्तिके भेदसे हान-स्वरूप आत्माके एक ही विषयमें तीन भेद होना उचित हो है। भावार्थ-व्याकरणमें कितने ही शब्दोंकी निरुक्ति करण-साधन, कर्तृसाधन और भाबसाधनकी अपेक्षा तीन-तीन प्रकारसे की जाती है। जहाँ करणकी मुख्यता होती है उसे करण-साधन कहते हैं, जहाँ कर्ताकी मुख्यता है उसे कर्तृ-साधन कहते हैं और जहाँ क्रियाको मुख्यता होती है उसे भाव-साधन कहते है। यहाँ आचायेने आत्मा, आत्माक परिगाम और चिन्तवन रूप क्रियामें नय विवक्षासे भेदाभेद रूपकी विवक्षा कर एक ही ध्यान शब्दकी तीनों साधनों-द्वारा निरुक्ति की है, जिस समय आत्मा और परिणाममें भेदविवक्षा की जाती है उस समय आत्मा जिस परिणामसे ध्यान करे वह परिणाम ध्यान कहलाता है ऐसी करणसाधनसे निरुक्ति होती है । जिस समय आत्मा और परिणाममें अभेद विवक्षा की जाती है उस समय जो परिणाम ध्यान करे यही ध्यान कहलाता है, ऐसी कर्तृसाधनसे निरुक्ति होती है और जहाँ आत्मा तथा उसके प्रदेशोंमें होनेवाली ध्यान रूप क्रिया में अभेद माना जाता है उस समय ध्यान करना ही ध्यान कहलाता है ऐसी भावसाधनसे निरुक्ति सिद्ध होती है ॥१३-१४॥ यद्यपि ध्यान ज्ञानकी ही पर्याय है और ध्येय अर्थात् ध्यान करने योग्य पदार्थोंको ही विषय करनेवाला है तथापि एक जगह एकत्रित रूपसे देखा जानेके कारण ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य रूप-व्यवहारको भी धारण कर लेता है। भावार्थ-स्थिर रूपसे पदार्थको जानना ध्यान कहलाता है इसलिए ध्यान ज्ञानकी एक पर्याय विशेष है। आत्माके जो प्रदेश ज्ञान रूप हैं वे ही प्रदेश दर्शन, सुख और वीर्य रूप भी हैं इसलिए एक ही जगह रहनेके कारण ध्यानमें दर्शन सुख आदिका भी व्यवहार किया जाता है ॥ १५॥ १. कायबल । २. ध्यानलक्षणयुक्तम् । ३. अभिप्रायमाश्रित्य । ४. चिन्तादिरूपम् । ५. उक्तलक्षणध्यानात् । ६.धोबलायत्तवृत्तिभावाज्जातम् । ७. ध्यानपर्यायाः । ८. करणव्युत्पत्त्या निष्पन्नम् । ९. सत्तामात्रमभिधातुमिच्छायां सत्यांम् । १०. आत्मस्वरूपस्य । ११. ध्याने । १२. करणकर्तृ भावसापनानां त्रयम् । १३. संबद्धो भूत्वा । -संदृष्टो ल०, ५०।-संदिष्टो द० । १४. एव इत्यर्थः । -वाच्यताम् ल., म., द.।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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