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________________ ४६१ विंशं पर्व ४ अतिक्रमणे धर्मे जिनाः सामायिकाहये । चरम्स्येकयमे प्रायश्चतुर्ज्ञान विलोचनाः ॥ १७१ ॥ छेदोपस्थापनाभेदप्रपञ्चोऽन्योन्य योगिनाम् । दर्शितस्तै यथाकालं बलायुर्ज्ञान वीक्षया ॥ १७२ ॥ ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्यं विशेषितम् । चारित्रं संयम त्राणं पम्बधोक्तं जिनाधिपैः ॥१७३॥ ततः संयमसिद्धयर्थं स तपो द्वादशात्मकम् । ज्ञानधे यंत्र लोपेतश्चचार परमः पुमान् ॥१७४॥ ततोऽनशनमस्युग्रं तेपे दीसतया मुनिः । अवमोदर्यमध्येकसि क्थादीत्याचरन्तपः ॥१७५॥ कदाचिद् वृत्तिसंख्यानं तपोऽतप्त स दुर्द्धरम् । वीथीवर्यादयो मस्य विशेषा बहुभेदकाः ॥ १७६ ॥ रसस्यागं तपो घोरं तेपे नित्यमतन्द्रितः । क्षीरसर्पिर्गुडादीनि परित्यज्याग्रिमः पुमान् ॥१७७ ॥ त्रिषु कालेषु योगी सनसौ कायमश्चिक्लिशत्" । कायस्य निग्रहं प्राहुः तपः परमदुश्चरम् ॥१७८॥ निगृहीतशरीरेण निगृहीतान्यसंश्रयम् । चक्षुरादीनि रुद्वेष तेषु रुद्धं मनो भवेत् ॥ १७९॥ मनोरोधः परं ध्यानं तत्कर्म क्षयसाधनम् । ततोऽनन्त सुखावाप्तिः ततः कार्य प्रकर्शयेत् ॥१८०॥ - है | तीर्थंकर भगवान् जिनकल्पी होते हैं और यही वास्तवमें उपादेय हैं । साधारण मुनियोंको यद्यपि प्रारम्भ अवस्थामें स्थविरकल्पी होना पड़ता है परन्तु उन्हें भी अन्तमें जिनकल्पी होनेके लिए उद्योग करते रहना चाहिए || १७०॥ मति, श्रुत, अबधि और मन:पर्यय इस प्रकार चार ज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करनेवाले तीर्थकर परमदेव प्रायः प्रतिक्रमणरहित एक सामायिक नामके चारित्र में ही रत रहते हैं। भावार्थ तीर्थकर भगवान् के किसी प्रकारका दोष नहीं लगता इसलिए उन्हें प्रतिक्रमण छेदोपस्थापना चारित्र धारण करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, वे केवल सामायिक चारित्र ही धारण करते हैं ।। १७१ || परन्तु उन्हीं तीर्थंकर देवने बल, आयु और ज्ञानकी हीनाधिकता देखकर अन्य साधारण मुनियोंके लिए यथाकाल छेदोपस्थापना चारित्रके अनेक भेद दिखलाये हैं-उनका निरूपण किया है || १७२ ॥ ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप और वीर्यकी विशेषता से संयमकी रक्षा करनेवाला चारित्र भी जिनेन्द्रदेवने पाँच प्रकारका कहा है। भावार्थ चारित्रके पाँच भेद हैं-१ ज्ञानाचार, २ दर्शनाचार, ३ चारित्राचार, ४ तपआचार और ५ वीर्याचार || १७३ ।। तदनन्तर ज्ञान, धैर्य और बलसे सहित परम पुरुष- भगवान् वृषभदेवने संयमकी सिद्धिके लिए बारह प्रकारका तपश्चरण किया था ॥ १७४॥ अतिशय उग्र तपश्चरणको धारण करनेवाले वे वृषभदेव मुनिराज अनशन नामका अत्यन्त कठिन तप तपते थे और एक सीथ (कम) आदिका नियम लेकर अवमौदर्य ( ऊनोदर) नामक तपश्चरण करते थे || १७५|| वे भगवान कभी अत्यन्त कठिन वृत्तिपरिसंख्यान नामका तप तपते थे जिसके कि बीथी, चर्या आदि अनेक भेद हैं || १७६|| इसके सिवाय वे आदिपुरुष आलस्यरहित हो दूध, घी, मुड़ आदि रसोंका परित्याग कर नित्य ही रसपरित्याग नामका घोर तपश्चरण करते थे || १७७ || वे योगिराज वर्षा, शीत और ग्रीष्म इस प्रकार तीनों कालों में शरीरको क्लेश देते थे अर्थात् कायक्लेश नामका तप तपते थे । वास्तव में गणधर देवने शरीरके निग्रह करने अर्थात् कायक्लेश करनेको ही उत्कृष्ट और कठिन तप कहा . है ।। १७८ || क्योंकि इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है कि शरीरका निग्रह होनेसे चक्षु आदि सभी इन्द्रियोंका निग्रह हो जाता है और इन्द्रियोंका निग्रह होनेसे मनका निरोध हो जाता है अर्थात् 1 १. नियमरहिते । २. एकव्रते । ३. चतुर्ज्ञानधर जिनादन्ययोगिनाम् । ४. चतुर्ज्ञानधरर्जनैः । ५. आलोकनेन । ६. संयमरक्षणम् । ७. मनोबलम् । ८. सिक्थादीन्या-प० अ० द० । ९. हेमन्तग्रीष्मप्राषटुकालेषु । १०. 'क्लिशि क्लेशे' उत्तप्तमकरोत् । ११. निगृहीतशरीरेण पुरुषेण । १२. कर्मक्षयहेतुम् । १३. कर्मक्षयात् । १४, तस्मात् कारणात् । १५. प्रकर्षेण कृशीकुर्यात् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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