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________________ ४५६ आदिपुराणम् 1 पुरं परार्ध्यशोभाभिः गतमन्यामिवा कृतिम् । प्राविक्षतां धृतानन्द' प्रेक्ष्यमाणों कुरुध्वजी ॥ १२० ॥ तपोवनमथो भेजे भगवान् कृतपारणः । जगज्जनतया सम्यगमिष्टुतमहोदयः ॥१२१॥ अहो श्रेय इति "श्रेयस्तच्छू यश्चेत्यभूत्तदा । श्रेयों यशोमयं विश्वं सद्दानं हि यशःप्रदम् ॥ १२२ ॥ तदादि तदुपशं तद्दानं जगति पप्रथे । ततो विस्मयमासेदुः भरताद्या नरेश्वराः ॥ १२३ ॥ कथं मर्तुरभिप्रायो विदितोऽनेन मौनिनः । कलबन्निति" चितेन मरतेशो "विसिष्मिये ॥ १२४॥ सुराश्च विस्मयन्ते स्म ते संभूय समागताः । प्रतीताः कुरुराजं तं पूजयामासुरादरात् ॥ १२५ ॥ ततो भरतराजेन श्रेयानप्रच्छि सादरम् । महादानपते ब्रूहि कथं शातमिदं स्वया ॥ १२६ ॥ अदृष्टपूर्व लोकेऽस्मिन् दानं कोऽर्हति वेदितुम् । भगवानिव पूज्योऽसि कुहराज स्वमद्य नः ॥ १२७ ॥ एवं दानतीर्थ कृच्छ्रयान् एवं महापुण्यभागसि । ततस्त्वामिति पृच्छामि यत्सत्यं कथयाच मे ॥ १२८ ॥ इत्यसौ तेन संपृष्टः श्रेबान् प्रत्यनवीदिदम् । दशनांशुककापेन ज्योत्स्नां तम्यन्निवान्तरे ॥ १२९ ॥ रुजाहरमिवासाद्य सामयः " परमौषधम् । पिपासितो" वा स्वच्छाम्बुकलितं सोत्पलं सरः ॥ १३० ॥ 13 19 हो गया है ऐसे राज गणको बड़ी कठिनाईसे उल्लंघन कर भीतर पहुँचे हुए अनेक लोग बारबार जिनकी प्रशंसा कर रहे हों और जिन्हें नगर निवासी जन बड़े आनन्द से देख रहे थे ऐसे उन दोनों कुरुवंशी भाइयोंने उत्कृष्ट सजावटसे अन्य आकृतिको प्राप्त हुएके समान सुशोभित होनेवाले नगर में प्रवेश किया ।।११४-१२०।। अथानन्तर-संसार के सभी लोग उत्तम प्रकारसे जिनके बड़े भारी अभ्युदयकी प्रशंसा करते हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव पारणा करके बनको चले गये ।। १२१|| उस समय 'अहो कल्याण, ऐसा कल्याण, और उस प्रकारका कल्याण' इस तरह समस्त संसार राजकुमार श्रेयान्सके यशसे भर गया था सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम दान यशको देनेवाला होता ही है ॥ १२२ ॥ संसारमें दान देनेकी प्रथा उसी समय से प्रचलित हुई और दान देनेकी विधि भी सबसे पहले राजकुमार श्रेयान्सने ही जान पायी थी। दानकी इस विधिसे भरत आदि राजाओंको बड़ा आश्चर्य हुआ था ।।१२३|| महाराज भरत अपने मनमें यही सोचते हुए आश्चर्य कर रहे थे कि इसने मौन धारण करनेवाले भगवान्‌का अभिप्राय कैसे जान लिया ॥ १२४॥ देवोंको भी उससे बड़ा आश्चर्य हुआ था, जिन्हें श्रेयान्सपर बड़ा भारी विश्वास उत्पन्न हुआ था ऐसे उन देवोंने एक साथ आकर बड़े आदरसे उसकी पूजा की थी || १२५|| तदनन्तर महाराज भरतने आदरसहित राजकुमार श्रेवान्ससे पूछा कि हे महादानपते, कहो तो सही तुमने भगवान्का यह अभिप्राय किस प्रकार जान लिया || १२६ || इस संसार में पहले कभी नहीं देखी हुई इस arrat विधिको कौन जान सकता है ? हे कुरुराज, आज तुम हमारे लिए भगवान् के समान ही पूज्य हुए हो ॥१२७|| हे राजकुमार श्रेयान्स, तुम दान - तीर्थकी प्रवृत्ति करनेवाले हो, और महापुण्यवान् हो इसलिए मैं तुमसे यह सब पूछ रहा हूँ कि जो सत्य हो वह आज मुझसे कहो ||१२८|| इस प्रकार महाराज भरत द्वारा पूछे गये श्रेयान्सकुमार अपने दाँतोंकी बिगोंके समूहसे बीच में चाँदनीको फैलाते हुएके समान नीचे लिखे अनुसार उत्तर देने गे ||१२९|| कि जिस प्रकार रोगी मनुष्य रोगको दूर करनेवाली किसी उत्कृष्ट ओषधिको पाकर प्रसन्न होता है अथवा प्यासा मनुष्य स्वच्छ जलसे भरे हुए और कमलों से १. विहितसंतोषं यथा भवति तथा। २. प्रेक्षमाणो द० । ३. कुरुमुख्यो । ४. आश्चर्यश्रेयोऽभूत् । ५. ईदूयोऽभूत् । ६. तादृक्श्रेयोऽभूत् । ७. 'श्रेयः प्रकर्षेण ख्यातिः' इति विश्वम् । यशोमयं श्रेयोऽभूत् । ८. तत्कालमादि कृत्वा । ९. तेन श्रेयोराजेन प्रथमोपक्रान्तम् । १०. विचारयन् । ११. आश्चर्य करोति स्म । १२. पृच्छयते स्म । १३. समर्थो भवति । १४. मध्ये । १५. व्याधिसहितः । १६. तृषितः १७. युक्तम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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