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________________ ४४६ आदिपुराणम् तदा भहारके याति' महामेराविवोनते । धरणो पादविन्यासान् प्रत्यैच्छदनुकम्पिनी ॥११॥ धात्री पदमराक्रान्ता संन्यमंक्ष्यदधस्तले । नाभविष्यत्प्रयत्नश्चेत्तपसीर्याश्रिते विभोः ॥१२॥ ततः पुराकरमामान् समडम्बान् सखर्वडान् । सखेटान् विजहारोच्चैः स श्रीमान् जङ्गमाद्रिवत् ॥१३॥ यतो यतः पदं धत्ते मौनी चयों स्म संश्रितः । ततस्ततो जनाःप्रीताः प्रणमन्त्येत्य सम्भ्रमात् ॥१४॥ प्रसीद देव किं कृत्यमिति केचिज गुर्गिरम् । "तूष्णोम्भावं व्रजन्तं च कंचित्तमनुवव्रजुः ॥१५॥ परे परार्ध्यरत्नानि समानीय पुरो न्यधुः । इत्यूचुश्च प्रसीदैनामिज्या प्रतिगृहाण नः ॥१६॥....... वस्तुवाहनकोटीश्च विभोः केचिदढोकयन्" । भगवांस्वास्वनथिस्यात् तूष्णीकां विजहार सः ॥१७॥ केचित् नग्वस्त्रगन्धादीनानयन्ति स्म सादरम् । भगवन् परिधरस्वेति पटल्यां सह भूषणैः ॥१८॥ केचित् कन्याः समानीय रूपयौवनशालिनीः । परिणाययितुं देवमुद्यता धिग्विमूढताम् ॥१९॥ केचिन्मज्जनसामग्र्या संश्रित्यो पारुधन विभुम् । परे मोजनसामग्री पुरस्कृत्योपतस्थिर ॥२०॥ जिस समय महामेरुके समान उन्नत भगवान् वृषभदेव विहार कर रहे थे उस समय कम्पायमान हुई यह पृथिवी उनके चरणकमलोंके निक्षेपको स्वीकृत कर रही थी ॥११।। यदि उस समय भगवान् वृषभदेवने ईर्यासमितिसे युक्त तपश्चरण धारण करनेमें प्रयत्न न किया होता तो सचमुच ही यह पृथिवी उनके चरणोंके भारसे दबकर अधोलोकमें डूब गयी होती। भावार्थ-भगवान ईर्यासमितिसे गमन करनेके कारण पोले-पोले पैर रखते थे इसलिए पृथ्वीपर उनका अधिक भार नहीं पड़ता था ।१२।। तदनन्तर चलते हुए पर्वतके समान उन्नत और शोभायमान भगवान् वृषभदेवने अनेक नगर, ग्राम, मडम्ब, खर्वट और खेटोंमें विहार किया था ॥१३॥ मुनियोंकी चर्याको धारण करनेवाले भगवान् जिस-जिस ओर कदम रखते थे अर्थात् जहाँ-जहाँ जाते थे वहीं-वहींके लोग प्रसन्न होकर और बड़े संभ्रमके साथ आकर उन्हें प्रणाम करते थे ॥१४॥ उनमें से कितने ही लोग कहने लगते थे कि हे देव, प्रसन्न होइए और कहिए कि क्या काम है तथा कितने ही लोग चुपचाप जाते हुए भगवानके पीछे-पीछे जाने लगते थे॥१५।। अन्य कितने ही लोग बहमल्य रत्न लाकर भगवान के सामने रखते थे और कहते थे कि देव, प्रसन्न होइए और हमारी इस पूजाको स्वीकृत कीजिए ॥१६॥ कितने ही लोग करोड़ों पदार्थ और करोड़ों प्रकारकी सवारियाँ भगवानके समीप लाते थे परन्तु भगवानको उन सबसे कुछ भी प्रयोजन नहीं था इसलिए वे चुपचाप आगे विहार कर जाते थे॥१७॥ कितने ही लोग माला, वस्त्र, गन्ध और आभूषणोंके समूह आदरपूर्वक भगवान्के समीप लाते थे और कहते थे कि हे भगवन् , इन्हें धारण कीजिए ॥१८|| कितने ही लोग रूप और यौवनसे शोभायमान कन्याओंको लाकर भगवान के साथ विवाह करानेके लिए तैयार हुए थे सो ऐसी मूर्खताको धिक्कार हो ॥१९॥ कितने ही लोग स्नान करनेकी सामग्री लाकर भगवान्को घेर लेते थे और कितने ही लोग भोजनकी सामग्री सामने रखकर प्रार्थना करते थे कि विभो, मैं स्नान १. आगच्छति सति । २. स्वीकृतवती। पादविक्षेपसमये पाणितलं प्रसार्य पादौ धतवतीति भावः । ३. चलनवती, ध्वनौ कृपावती । ४. अधिकं निमज्जनमकरिष्यत् तर्हि पाताले निमज्जतीत्यर्थः । 'टुमस्जो शुद्धौ' । लुङ् । सत्यमझ्य-द०, ल०, म० । ५. ई-समित्याश्रिते। ६. समटम्बान् सखवटान् ल०, म०, द० । ७. मुनिसंबन्धिनीम् । ८. वर्तनाम् । ९. आगत्य । १०. ऊचुः । ११. तूष्णीमित्यर्थः । १२. सह गच्छन्ति स्म । १३. गुरोरने न्यस्यन्ति स्म । १४. प्रापयामासुः । १५. अनभिलाषित्वात् । १६. स्वार्थे कप्रत्ययात्, तूष्णोमित्यर्थः । तूष्णीकं द०, ५०, स०। १७. पटल्या अ०, ५०, द०, ल०, म०। १८. प्रार्थयन्ति स्म । १९. पूजयामासुः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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