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________________ ४३० आदिपुराणम् . . कमलिनीवनरेणुविकर्षिभिः कुसुमितोपवनदुमधूननैः । विमुपैति सदा खचरीजनो रतिपरि श्रमनुद्धिरिहानिलैः ॥१०९॥ हरिरितः प्रतिगर्जति कानने करिकुलं वनमुमति तद्भयात् । परिगलरकवलं च मृगीकुलं गिरिनिकुम्जतला दवसर्पति ॥११०॥ सरसि हंसवधूरियमुत्सुका कमलरेणुविपिजरमजसा। समनुयाति न कोकविशकिनी 'सहचरं गलदश्रु विरौति च ॥११॥ इयमितो बत कोककुटुम्बिनी कमलिनीनवपत्रतिरोहितम्। अनवलोक्य मुहुः सहचारिणं भ्रमति दीनस्तैः परितः सरः ॥११२॥ इह शरद्धनमल्पकमाश्रितं मणितटं सुरखेचरकन्यकाः । लघुतया 'सुखहार्यमितस्ततः प्रचलयन्ति नयन्ति च कर्षण: ॥११३॥ "असुमतां "सुमताम्भसमाततां धृत घनान्तधनामिव वोचिभिः । 'ततवनान्तवनाममरापगां वहति सान मिरेष महाचलः ॥११॥ "असुतरां सुतरी पृथुमम्मसा पतिमितम तिमितान्त लतावनाम् । अनुगतां नु गतां स्वतटोपमां वहति सिन्धुमयं धरणीधरः ॥११५॥ सदा ही जागृत रहा करता हो ॥१०८।। जो कमलवनके परागको खींच रहा है, जो उपवनोंके फूले हुए वृक्षोंको हिला रहा है और जो संभोगजन्य परिश्रमको दूर कर देनेवाला है ऐसे वायुसे यहाँकी विद्याधरियाँ सदा सन्तोषको प्राप्त होती रहती हैं ॥१०९॥ इधर इस वनमें यह सिंह गरज रहा है उसके भयसे यह हाथियोंका समूह वनको छोड़ रहा है और जिनके मुखसे प्रास भी गिर रहा है ऐसा यह हरिणियोंका समूह भी पर्वतके तलागृहोंसे निकलकर भागा जा रहा है ।।११०। इधर तालाबके किनारे यह उत्कण्ठित हुई हंसिनी, जो कमलके परागसे बहुत शीघ्र पीला पड़ गया है ऐसे अपने साथी-प्रिय हंसको चकवा समझकर उसके समीप नहीं जाती है और अश्रु डालती हुई रो रही है ।।१११।। इधर यह चकवी कमलिनीके नवीन पत्रोंसे छिपे हुए अपने साथी-चकवाको न देखकर बार-बार दीन शब्द करती हुई तालाबके चारों ओर घूम रही है ॥११२॥ इधर इस पर्वतके मणिमय किनारेपर यह शरऋतुका छोटा-सा बादल आ गया है, हलका होनेके कारण इसे सब कोई सुखपूर्वक ले जा सकता है और इसीलिए ये देव तथा विद्याधरोंकी कन्याएँ इसे इधर-उधर चलाती हैं और खींचकर अपनी-अपनी ओर ले जाती हैं ॥११॥ जो सब जीवोंको अतिशय इष्ट है, जो बहुत बड़ी है, जो अपनी लहरोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो उसने शरद्ऋतुके बादल ही धारण किये हों और जिसका जल वनोंके अन्तभाग तक फैल गया है ऐसी गंगा नदीको भी यह महापर्वत अपने निचले शिखरों पर धारण कर रहा है॥११४॥ और, जो अतिशय विस्तृत है जो कठिनतासे पार होने योग्य है, जो लगातार समुद्र तक चली गयी है जिसने लताओंके वनको जलसे आई कर दिया है तथा जो अपने किनारेकी उपमाको प्राप्त है ऐसी सिन्धु नदीको भी यह पर्वत धारण कर रहा १. स्वीकुर्वाणः । २. धूनकैः इत्यपि पाठः । ३. संतोषम् । ४. खेदविनाशकः । ५.-कुञ्जकुलाइत्यपि पाठः । ६.प्रियतमं हंसम् । ७. चक्रवाकस्त्री। ८, प्रियकोकम् । ९. सुखेन प्रापणीयम् । १०. आकर्षणः। ११. प्राणिनाम् । १२. सुष्ठुसम्मतजलाम् । १३. शरत्कालमेघाम् । १४. विस्तृतवनमध्यजलाम् । १५. दुस्तराम् । १६. नितराम् । १७. समुद्रगताम्। १८.आद्रितसमीपवल्लीवनाम् । १९.अनुगस्य भावः अनुगता ताम् । २०. नु स्वतां ल०, म. । नु इव ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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