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________________ अष्टादशं पर्व ४११ इस्युक्तवन्तौ प्रत्याय्य सोपायं फणिनां पतिः । भगवन्तं प्रणम्याशु युवानावनयत् समम् ॥१४५॥ स ताभ्यां फणिनां भर्ता रेजे गगनमुत्पतन् । युनस्तापप्रकाशाभ्यामिव मास्वान् महोदयः ॥१४६॥ बमौ फणिकुमाराभ्यामिव ताभ्यां समन्वितः । प्रश्रयप्रशमाभ्यां वा युक्तो योगीव भोगिराट् ॥१४॥ स व्योममार्गमुत्पत्य विमानमधिरोप्य तौ। द्वाक् प्राप विजयादि भूदेश्या हसितोपमम् ॥१८॥ स्वपूर्वापरकोटिभ्यां विगाह्य लवणार्णवम् । मध्ये भारतवर्षस्य स्थितं तन्मानदण्डवत् ॥१४९॥ विराजमानमुत्तुङ्गेर्नानारत्नांशुचित्रितैः । मकुटैरिव कूटैः स्वैः स्वैरमारुदखाङ्गणैः ॥१५०॥ निपतन्निरारावैरापूरितगुहामुखम् । व्याजुहूषुमिवातान्तं विश्रान्स्य सुरदम्पतीन् ॥१५॥ महद्भिरचलोदप्रैः संचरद्मिरितोऽमुतः । घनाघनैर्घनध्वाने विध्वगारुद्धमेखलम् ॥१५२॥ स्फुरच्चामीकरप्रस्थैदीप्तैरुष्णायुरश्मिभिः । ज्वलद्दावानलाशकां जनयन्तं नभोजुषाम् ॥१५३॥ क्षरमिः शिखरोपान्ता व्यायताद् गुरुनिझरः । धनैर्जर्जरितैरारादारब्ध बहुनिझरम् ॥१५॥ "नूनमामोदलोभेन प्रोत्फुल्ला वनवल्लरीः । विनीलैरंशुकैर्विष्वक् विदधानमलिच्छलात् ॥१५॥ को सामग्री इष्ट नहीं है ॥१४४|| इस प्रकार कहते हुए कुमारोंको युक्तिपूर्वक विश्वास दिलाकर धरणेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर उन्हें शीघ्र ही अपने साथ ले गया ॥१४५।। महान् ऐश्वर्यको धारण करनेवाला वह धरणेन्द्र उन दोनों कुमारोंके साथ आकाशमें जाता हुआ ऐसा शोभाय. मान हो रहा था मानो ताप और प्रकाशके साथ उदित होता हुआ सूर्य ही हो ॥१४६।। अथवा जिस प्रकार विनय और प्रशम गुणसे युक्त हुआ कोई योगिराज सुशोभित होता है उसी प्रकार नागकुमारोंके समान उन दोनों कुमारोंसे युक्त हआ वह धरणेन्द्र भी अतिशय सशोभित हो रहा था ॥१४७॥ वह दोनों राजकुमारोंको विमानमें बैठाकर तथा आकाशमार्गका उल्लंघन कर शीघ्र ही विजयाध पर्वतपर जा पहुँचा, उस समय वह पर्वत पृथ्वीरूपी देवीके हास्यकी उपमा धारण कर रहा था ॥१४८।। वह विजयार्ध पर्वत अपने पूर्व और पश्चिमकी कोटियोंसे लवण समुद्र में अवगाहन (प्रवेश) कर रहा था और भरतक्षेत्रके बीच में इस प्रकार स्थित था मानो उसके नापनेका एक दण्ड ही हो ॥१४९॥ वह पर्वत ऊँचे, अनेक प्रकारके रत्नोंकी किरणोंसे चित्र-विचित्र और अपनी इच्छानुसार आकाशांगणको घेरनेवाले अपने अनेक शिखरोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो मुकुटोंसे ही सुशोभित हो रहा हो ॥१५०।। पड़ते हुए निझरनोंके शब्दोंसे उसकी गुफाओंके मुख आपूरित हो रहे थे और उनमें ऐसा मालूम होता था मानो अतिशय विश्राम करनेके लिए देव-देवियोंको बुला ही रहा हो ॥१५१।। उसकी मेखला अर्थात् वीचका किनारा पर्वतके समान ऊँचे, यहाँ-वहाँ चलते हुए और गम्भीर गर्जना करते हुए बड़े-बड़े मेघों-द्वारा चारों ओरसे ढका हुआ था ॥१५२।। देदीप्यमान सुवर्णके बने हुए और सूर्यकी किरणोंसे सुशोभित अपने किनारोंके द्वारा यह पर्वत देव और विद्याधरोंको जलते हुए दावानलकी शंका कर रहा था ॥१५३।। उस पर्वतके शिखरोंके समीप भागसे जो लम्बी धारवाले बड़े-बड़े झरने पड़ते थे उनसे मेघ जजेरित हो जाते थे और उनसे उस पर्वतके समीप ही बहुत-से निझरने बनकर निकल रहे थे ॥१५४॥ उस पर्वतपर-के वनोंमें अनेक लताएँ फूली हुई थी और उनपर भ्रमर बैठे हुए थे, उनसे वह पर्वत ऐसा मालूम होता था मानो सुगन्धिके लोभसे वह उन वनलताओं - १. विश्वासं नीत्वा । २. अथवा । ३. मुकुट-अ०, प० । ४. व्याह्वातुमिच्छुम् । ५. नितान्तं प्रसन्नम् । ६. पर्वतबदुन्नतेः । ७. बहलनिस्वनैः । ८. आयतात् । विस्तीर्णादित्यर्थः ।-व्यायत-अ०, म०, ल. ९. स्थूलजलप्रवाहैः । १० भिन्नैः । ११. इव ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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