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________________ ४०४ आदिपुराणम महानशनमस्यासीत् तपः षण्मासगोचरम् । शरीरो पचयस्त्विद्धः तथैवास्थादही धृतिः ॥७३॥ . नानाशुषो ऽप्यभूद मतुः स्वल्पोऽप्यङगे परिश्रमः। निर्माणातिशयः कोऽपि दिव्यः स हि महात्मनः॥७४॥ संस्कारविरहात् केशा जटीभूतास्तदा विभोः । नूनं तेऽपि तपःक्लेशमनुसोढुं तथा स्थिताः ॥७५॥ मुनेनि जटा दुरं प्रसम्रः पवनोद्धताः । ध्यानाग्निनेव तप्तस्य जीवस्वर्णस्य कालिकाः ॥७६॥ तत्तपोऽतिशयात्तस्मिन् काननेऽभूत् परा धुतिः । नक्तं दिवा च बालाकतेजसवाततान्तिकं ॥७॥ शाखाः पुष्पफलानम्राः शाखिनां तत्र कानने । बभुर्भगवतः पादौ नमन्स्य इव भक्तितः ॥७॥ तस्मिन् वने वनलता भृगसंगीतनिःस्वनैः। 'उपवीणितमातेनुरिव भक्त्या जगद्गुरोः ॥७९॥ पर्यन्तवर्तिनः क्षमाजा गलद्भिः कुसुमैः स्वयम् । पुष्पोपहारमातन्वनिव-भक्त्यास्य पादयोः ॥८॥ मृगशावाः पदोपान्तं स्वैरमध्यासिता मुनेः । तदाश्रमस्य शान्तस्वमाचख्युः सामिनिद्रिताः ॥८॥ मृगारित्वं समुत्सृज्य सिंहाः संहतवृत्तयः" । बभूवुर्गजयूथेन माहात्म्यं तदियोगजम् ॥४२॥ कण्टकालग्नबालाग्राश्चमरीश्च मरीमृजाः । नखरः स्वैरहो व्याघ्राः सानुकम्पं व्यमोचयन् ॥८३।। प्रस्नुवाना महाव्याघ्रीरुपेत्य मृगशावकाः । स्वजनन्यास्थया स्वैरं पीस्वा स्म सुखमासते ॥४॥ गुणोंमें बहुत ही विशुद्धता रहती थी ।।७०-७२।। यद्यपि भगवान्ने छह महीनेका महोपवास तप किया था तथापि उनके शरीरका उपचय पहलेकी तरह ही देदीप्यमान बना रहा था। इससे कहना पडता है कि उनकी धीरता बडी ही आश्चर्यजनक थी। ॥७३॥ यद्यपि भगवान बिलकुल ही आहार नहीं लेते थे तथापि उनके शरीर में रंचमात्र भी परिश्रम नहीं होता था। वास्तव में भगवान वृषभदेवकी शरीररचना अथवा उनके निर्माण नामकर्मका ही वह कोई दिव्य अतिशय था ।।७४।। उस समय भगवान के केश संस्काररहित होने के कारण जटाओंके समान हो गये थे और वे ऐसे मालूम होते थे मानो तपस्याका क्लेश सहन करनेके लिए ही वैसे कठोर हो गये हों ।।७५।। वे जटाएँ वायुसे उड़कर महामुनि भगवान वृषभदेवके मस्तकपर दूर तक फैल गयी थीं, सो ऐसी जान पड़ती थीं मानो ध्यानरूपी अग्निसे तपाये हुए जीवरूपी स्वर्णसे निकली हुई कालिमा ही हो ॥७६।। भगवानके तपश्चरणके अतिशयसे उस विस्तृत वनमें रात-दिन ऐसी उत्तम कान्ति रहती थी जैसी कि प्रातःकालके सूर्यके तेजसे होती है ।।७।। उस वनमें पुष्प और फलक भारसे नम्र हुई वृक्षोंकी शाखाएँ ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो भक्तिसे भगवानके चरणोंको नमस्कार ही कर रही हों ।।७८|| उस वनमें लताओंपर बैठे हुए भ्रमर संगीतके समान मधुर शब्द कर रहे थे जिससे वे वनलताएँ ऐसी मालूम होती थीं मानो भक्तिपूर्वक वीणा बजाकर जगद्गुरु भगवान वृषभदेवका यशोगान ही कर रही हों ॥७९॥ भगवानके समीपवर्ती वृक्षोंसे जो अपने आप ही फूल गिर रहे थे उनसे वे वृक्ष ऐसे जान पड़ते थे मानो भक्तिपूर्वक भगवानके चरणों में फूलोंका उपहार ही विस्तृत कर रहे हों अर्थात् फूलोंकी भेंट ही चढ़ा रहे हों ॥८॥ भगवानके चरणोंके समीप ही अपनी इच्छानुसार कुछ-कुछ निद्रा लेते हुए जो हरिणोंके बच्चे बैठे हुए थे वे उनके आश्रमकी शान्तता बतला रहे थे ॥८शा सिंह हरिण आदि जन्तुओंके साथ बैरभाव छोड़कर हाथियोंके झुण्डके साथ मिलकर रहने लगे थे सो यह सब भगवानके ध्यानसे उत्पन्न हुई महिमा ही थी ।।८२॥ अहा, कैसा आश्चर्य था कि जिनके बालोंके अंग्रभाग काँटोंमें उलझ गये थे और जो उन्हें बार-बार सुलझानेका प्रयत्न करती थीं ऐसी चमरी गायोंको बाघ बड़ी दयाके साथ अपने नखोंसे छुड़ा रहे थे अर्थात् उनके बाल सुलझा कर उन्हें जहाँ-तहाँ जाने के लिए स्वतन्त्र कर रहे थे ।।८।। हरिणोंके बच्चे दद्ध देती हुई बाघनियोंके पास जाकर और उन्हें अपनी माता समझ इच्छानुसार दूध पीकर सुखी १. पुष्टिः । २. दीप्तः । ३. संतोषः। ४. अनशनवृत्तिनः । ५. शरीरवर्गणातिशयः। ६. अपरिश्रमः । ७. इव । ८. 'म गतो' लिट् । ९. वीणया उपगीयते स्म । १०. ईपन्निद्रिताः। ११. युवतप्रवृत्तयः । १२. पुनः पनर्मार्जनं कुर्वन्तः । १३. क्षीरं क्षरन्तीः । १४. निजमातृवृद्ध्या ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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